Category Archives: Abstract Poems

Hindi Poem-आज का कलियुग


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आज का यह युग
जिसे कहते हम कलियुग
गांधी जैसे महात्मा
कसाब जैसे शैतान का युग
मानते है लड़की को देवी जहाँ
फिर भी गर्भ मे उनकी हत्या करने वालों का युग
करते है रात रात भर देवी जागरण
ऐसे कुछ भक्तों और दिल्ली के उन दरिंदो युग
नोकरी से पहले खाते ईमानदारी की कसमें
फिर भी १०० में ९० बेईमानों का युग
यहाँ अमीर कम खाता है
क्योंकि सुना है ज्यादा खाने से पेट बढ़ जाता है
सबका पेट भरने की खातिर जो किसान पसीना बहाता है
आखिर वही किसान भूख से मर जाता है
ये है बलवानों का युग,
राजतंत्र के पहलवानों का युग
चुनाव से पहले जो घर आते उन सज्जनों का युग,
चुनाव के बाद जो भूल जाते उन दुर्जनों का युग
यहाँ अमीर गरीब नहीं गरीबों को हटाते हैं
उनका कहना है गरबों के झोपड़े उनके महलों पे दाग लगाते हैं
एक तरफ ये ए.सी मे आराम फरमाते हैं
दूसरी तरफ वही गरीब लोग गर्मी से फड़फड़ाते हैं
राम नहीं,रहीम नहीं,ना समय अब कबीर का
भूल गए सब दोहे,वक़्त अब हनी सिंह का
भूल गए अब सब मंत्र
पूजा करता खुद अब संगीत यंत्र
हे भगवन आया केसा युग है
मित्रों जरा संभल के, घोर कलियुग है

-नितेश गौर

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Hindi Poem for Indian Music -संगीत के सात स्वर


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आओ मिलकर सीखें आज
संगीत के सात स्वर सरताज
पहला स्वर है सा
इस से शुरू होता है साज़
दूसरा स्वर है रे
इस से बढ़ते हैं आगे आज
तीसरा स्वर है ग
इस से होता है गाना आगाज़
चौथा स्वर है म
इस से बढ़ता है आगे साज़
पांचवा स्वर है प
इस से आगे ऊंचा रियाज़
छठा स्वर है ध
इसे गायें बेहतर आज
सातवा स्वर है नि
इस पर खत्म हुआ स्वरों का राज़

-अनुष्का सूरी

Patriotic Hindi Poem- भारत


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है धरम भूमि ये भारत की
जहाँ वीर जवान सर झुकाते हैं
कितना खून पसीना बहाकर
आज हम आज़ादी का दिन  मनाते हैं
जिनके माथे जनम भूमि का तिलक को
वो वीर भारत माता की शान बन जाते हैं
जिसने दुश्मनों को मार गिराया
आज उस वीर को भारत ने सलाम किया
जिस भारत ने दिया हमें जनम
जहाँ से अपनी पहचान बनी
आज उसी  संविधान को
हम बार बार नमन  करते हैं
पूरे देश में आज हम
गणतंत्र दिवस मनाते हैं
जय हिन्द
जय भारत
जय जवान
जय किसान
– संगीता श्रीवास्तव

Hindi Motivational Poem on Life- नयी राह


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आज है नयी राह
एक नयी चाह
जीवन को जीने की
दुःख को सीने की
फूलों की खुशबू
कोयल की कु कु
बारिश का पानी
संतों की वाणी
आज सब है सुन्दर
आज सब है बेहतर
क्योंकि दिल में चाहत
करे अब दस्तक
जी लो ये जीवन
जी लो ये जीवन
– अनुष्का सूरी

Metropolitan Zindagi-Hindi Poem on Busy City Life


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मेट्रोपॉलिटन ज़िन्दगी

दरवाज़े की हुई दस्तक को दरकिनार करना शहरियों की आदत सी हो गयी है
अक्सर किस्मत भी घंटी मार के लौट जाती है परेशान होकर
और कभी खुदा मिलने आया तो उसे भी वापिस जाना पड़ा वक़्त खोकर

सुबह और शाम का मंज़र एक सा लगता है
बहार किसी के होने या न होने से फरक भी क्या पड़ता है
वो क्यों जी रहे हैं दरबों में बंद कबूतरों की तरह
क्या पंख उनके भूल गए हैं उड़ने की कला

दूसरों के काम आने को वो सौदा गलत मान गए
रब ने बनाई दुनिया को “बकवास” और उसके बन्दे को “बेगाना” बता गए
बड़े दिन बाद बहार देखी लेकिन बिना दुआ सलाम के ही फिर मुंह बनाके अंदर चले गए
और लुत्फ़ उठा न सके क्योंकि
दरवाज़े की हुई दस्तक को दरकिनार करना शहरियों की आदत सी हो गयी है

-निवेता