Covid-Pandemic

now browsing by category

 

Hindi Poem on Covid Pandemic-कोरोना महामारी पर कविता

बेबस धरा

उमंग सी किलकती धरा,

हरी ओढ़नी ओढे भू-धरा।

मायूस हो गई है क्यूँ ऐ बता,

क्या खता हमारी अक्षम्य सी।

है प्रण अब रक्षा हम करे,

अपनी धरा के खजानों की।

दे रही है जो हमें जीवनदान,

हम क्यूँ न सहेजे ऐसा मूल्यवान।

होते इस संकट से पार,

जिसके जन है सबसे बङे गुनहगार।

आज न होती बेबस धरा,

गर हम न दोहरे जन्नत सी धरा।

है प्राण वायु के लाले पङे,

धरती ने क्या हमें कम दिए।

पर न समझ हम रह गए,

जो अब सबब दे रही धरा।

है चीत्कार फैला यहाँ,

श्मशान भी पटे है पङे।

क्या जान की कीमत अब समझ रहें,

तो बचा लो इस धरोहर को सदा।

जो दे रही खूबसूरत धरा,

गुनहगार है हर शख्स यहाँ।

प्रकृति ले रही हिसाब यह,

अब तो समझ लो।

क्यूँ है ये बेबस धरा।।

दीक्षा सिंह

Hindi Poem on Covid Crisis in India-Samay Kuch Aisa Aya Hai|कोविड महामारी का प्रकोप कविता

समय कुछ ऐसा आया है

समय आया ही कुछ ऐसा है कि

लबों पे बातों से ज्यादा खामोशी अच्छी लगने लगी है

सोचा ना था कभी ऐसा भी समय आएगा कि

इंसान सांस के एक-एक कतरे के लिए केहराएगा

किसी हँसते खिलखिलाते परिवार का एक लौता चिराग

ज़िंदगी और मौत का दरवाज़ा खट खटाएगा .

तोह कोई बच्चा अपने माँ बॉप की ज़िंदगी के लिए

अस्पताल दर अस्पताल ठोकरें खायेगा

सोचा ना था कभी की ऐसा समय भी आएगा

खुद के अपने मुश्किल में हो

फिर भी इंसान मदद करने से कतराएगा

सोचा ना था कभी की ऐसा अजीबो गरीब समय भी आएगा

क्या अमीर क्या गरीब दोनो को जिंदगी के एक मोड़ पर ले आएगा

सांसों की इस लड़ाई में कोई जीतेगा तोह कोई हार जाएगा

कभी सोचा ना था की ऐसा भी समय आएगा

अपनों के देखभाल के लिए अपनों से जुदा होना पड़ जाएगा

बदन को अतरंगी चीज़ों से ढक कर दूर से ही होंसला बढ़ाना पड़ जाएगा

सोचा ना था की एक ऐसा भी समय आ जाएगा

अजित कुमार चौबे