Category Archives: Hindi Poems on Issues and Concerns

Hindi Poem on Poverty – ग़रीबी


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आज निकल के घर से बाहर गया,
तो देखा उन दीन-दुखियारो को,
नन्हे हाथो मे खाली कटोरी,
और नयनो से निकलते अश्रु धारो को।
जिन्हे देख हृदय पसीज गया,
मन मेरा बेबस हो गया ,
उनके हाथो के सिक्को को सुन,
आज मैं तो संगीत भूल गया।
जिन्हे देख सहसा मैं ठहरा,
मानो कुछ देर अमीर मैं बन गया,
उन्हे देकर चंद सिक्के मैं,
उनकी दुआओ से गरीब मैं बन गया।

-नीरज चौरसिया

Aaj nikal k ghr se bahar gya
Too dekha un din-dukhiyon ko
Nanhe hathon me khali ktori
Aur nano se nikle ashru ki dharo ko
Jinhe dekh hirdya psij gya
Man mera bebas ho gya
Unke hatho k sikko ko sun
Aaj main to sangeet bhl gya
Jinhe dekh sahsa main thahra
Mano kuch deir amir main bn gya
Unhe de kr chand sikke main 
Unki duaao se grib main ban gya

– Niraj Chaurasiya

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Hindi Poem on Education – पढ़ाई 


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उठो चलो सब करें पढ़ाई
यही असली धन है भाई
क ख ग घ सब वर्ण रट लो
अंग्रेज़ी के ए बी सी डी से निपट लो
गुनाह भाग जोड़ सब सीख लो
मेहनत करो न भीख लो
चाहे बनो डॉक्टर इंजीनियर या प्रोफेसर
या करो अपना व्यापार
पढ़ाई का ही ज्ञान है
जो लगाएगा तुमको पार
बढ़ोगे अागे जब होगी संग पढ़ाई
इसके सिवा कुछ काम न अाई
 
– अनुष्का सूरी 

 

Utho chlo sb kre pdhai
Yhi asli dhan hai bhai
K kh g gh sab vrn rtt lo
Angreji me A B C D se nipat lo
Guna bhag jod sb sikh lo
Mehnat kro na bikh lo
Chahe bno Doctor Engineer ya Professor
Ya kro apna vyapar
Pdhai ka hi gyaan hai
Jo lgayega tumko par
Badoge aage jab hogi sng pdhai
Eske siva kuch kaam na aai
 
– Anushka Suri

Poem on Modern Life-आधुनिक युग


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कुछ गाड़ियों में चलते है कुछ टुकड़ो पर पलते है,

कुछ ऐ सी में रहते है कुछ सड़को पर सड़ते है,

इन्शानियत को भूलकर लोग धर्मो के लिए लड़ते हैं,

लानत है इस युग पे जिसे आधुनिक कहते है ।

इस दुनियाँ में भी लोग अजीबोगरीव रहते है,

कुछ इंग्लिश का पउआ लगाते कुछ रोटी को तरसते है,

बुजुर्गो को ठुकराकर लोग गाय को माता कहते है,

कुछ दुःखों से वंचित तो कुछ हँसते हँसते सहते हैं,

लानत है इस युग पे जिसे आधुनिक कहते है ।

गरीबो की मेहनत पूँजीपति खा रहे हैं,

आजकल के विद्यार्थी यो यो हनी सिंह गा रहे है,

पेड़ दिन बा दिन तेजी से काटे जा रहे है,

खुद जंगल कटवाकर धरती को माँ कहते है,

लानत है इस युग पे जिसे आधुनिक कहते है ।

बेघर हुए जंगली को जो जानवर कहते है,

वो क्या जानें असली जानवर तो शहरो में रहते है,

रेप की घटनाएँ इस कदर हो रही हिंदुस्तान में,

इंसानियत मिटती जा रही है आज के इंसान में,

कुछ लोग बेटियों को धरती का बोझ समझते  है,

लानत है इस युग पे जिसे आधुनिक कहते है।

कोई अपनों को खोता है कोई भूखे पेट सोता है,

जिंदगी के सफ़र में हर गरीब रोता है,

बहुत से झमेले हैं इन दर्द गमो के मेले में,

जीकर भी तू मर रहा गुमनामी और अकेले में,

जिंदगी तो मेहमान है पल दो पल जी लेने में,

हर दुःख और हर गम हँसकर पी  लेने में,

किसी को होती नहीं सूखी रोटी तक नसीब,

कोई खिला रहा कुत्तो को ब्रेड बटर के पीस

इन ब्रेड बटर को देखकर बदनसीबो के दिल मचलते है,

लानत है इस युग पे जिसे आधुनिक कहते है ।

-राहुल कुमार

Hindi Poem Expressing Pain of Peshawar Attack


लूट के ज़िंदगी वो मासूमों की ज़िंदगी को तार तार कर गये,
हज़ारों माँ-बापों को रुला के वो ज़िंदगी बेज़ार कर गये,
हर शाम अब तन्हा है ना घर में अब कोई शोर है, पसरी है वीरानियाँ, हर आंख में आँसुओं का ज़ोर है,
कभी देखते उस माँ का दिल जो अब कभी ना मुस्कुराएगा, अब ना किसी को कोई पापा कहके बुलायेगा,
रोती रहेगी अब हर आंख जब याद उनकी आयेगी, शायद अब उनकी दुनिया फिर ना मुस्कुराएगी,
इंसानियत के दुश्मनों ने दुनिया को ज़ार ज़ार कर दिया, बहके खून मासूमों का इंसानियत को तार तार कर दिया,
कौमों को जो दिखाते हैं धर्म की एक झूठी दुनिया उनमें ना खुदा का खौफ है, इंसानियत को तबाह करने का ये चला कैसा दौर है,
हर मुल्क हर जामूरीयत ये जान ले इंसानियत के दुश्मन तो सिर्फ दुश्मन हैं, जिनको मिटाके फिर से मुस्कुराना है,
ज़िंदगी को कहना है, हर आतंकी से जंग जीत जाना है,
फिर ना झेले कोई वंश ये पेशावॉर सा, फिर ना सूनी हो गोद किसी की, ना वीराना सा आंगन हो, यही खुदा से इल्तजा है, यही हर नरम आंख का कहना है|
-गौरव

Hindi poem on sickness-मैं बीमार हूँ


आज कल कुछ तकलीफ में हूँ
हाँ मैं बीमार हूँ
काम कुछ हो नहीं पाता
सर भी है थोड़ा थोड़ा चकराता
खाना ठीक से खाया नहीं जाता
बाज़ार तक भी जाया नहीं जाता
बिस्तर पर लेटे रहने को
डाक्टर ने है कहा
खानी पड़ती है
रोज़ कड़वी कड़वी दवा
मेरी हालत को देख कर
याद सदा यह रखना
खाओ पियो स्वस्थ रहो
और हर बीमारी से बचना