Category Archives: Hindi Poems

Hindi Poems on Emotions- कायर जिसे समझा


कायर जिसे समझा जाँबाज निकला
उसका अलग ही अंदाज निकला

बेचता रहा जो उम्र भर दवाइयाँ
बुढ़ापे में दवा को मोहताज निकला

ईमानदारी का ढिंढोरा पीटने वाला
खुद बेईमानों का सरताज निकला

जिसे हमने जहर समझकर फेंक दिया
हमारी बीमारी का इलाज निकला

मारे जाओगे अगर सत्ता के विरुद्ध
मुख से एक भी अल्फाज निकला

गैर को बदनाम मत कर ‘राहुल’
अपना ही अक्सर दगावाज निकला

  • राहुल रेड
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Hindi Poems on Motivation – भँवर में सही


भँवर में सही कश्ती को मोड़कर तो देखो
बारिश में पैर जमीं पे गड़ाकर तो देखो

कुछ भी है मुमकिन अगर ठान लें हम सब
हाँथ समानता की ओर बढ़ाकर तो देखो

भेदभाव ख़त्म कर अब अपनी बेटी को
शिक्षा के शिखर पर चढ़ाकर तो देखो

हुनर है इनमे दुनियाँ को बदलने का
बेटियों को बेटों सा पढ़ाकर तो देखो

हैं इनमे सुनीता और कल्पना सी उड़ान
इनके पंखो को फड़फड़ाकर तो देखो ।

– राहुल रेड

Bhanvar mein sahi kashti ko modkar to dekho
barish mein pair zamin pe gada kar to dekho

Kuch bhi hai mumkin agar thaan le hum sab
Hath smanta ki oor badha kar to dekho

Bhed bhav khatam kar ab apni beti ko
Shiksha ke shikhar par chadha kar to dekho

Hunar hai inmein duniya ko badalne ka
Betiyon ko beto sa padha kar to dekho

Hai inmein sunita aur kalpana si udaan
Inke pankhon ko fadfada kar to dekho

– Rahul Red

Hindi Poems on Emotions – बदनामी


 

महफ़िल सजा ली यारों की, तो हुई बदनामी
बगिया खिला ली बहारों की, तो हुई बदनामी
यह कैसा समाज, जो बदनाम करता फिरता है?
मदद कर दी बेसहारों की, तो हुई बदनामी।

किसी पे दिल अगर ये मर लिया, तो हुई बदनामी
बाँहों में किसी को भर लिया, तो हुई बदनामी।
बदनामी के दौर में भला कौन है बदनाम नही?
कभी प्यार किसी से कर लिया, तो हुई बदनामी

अगर आजदी से घूम लिया, तो हुई बदनामी
महफ़िल में कभी झूम लिया, तो हुई बदनामी
प्रेम को बदनाम कर दिया जालिमो ने इतना
माथा जो उसका चूम लिया, तो हुई बदनामी।

रोकूँ कैसे यारों आज होने से बदनामी?
स्याही के कुछ दाग भी धोने से बदनामी
जिसको पाकर बदनाम ही बदनाम हुआ हूँ
छोड़ दूँ अगर साथ उसे खोने से बदनामी।

जब ज्यादा हो पैसा, तो होती है बदनामी
चाहें गरीब हो कैसा, तो होती है बदनामी
जब बदनामी का दौर है, फिर मैं कैसे बचूँ?
हो इन्शान मेरे जैसा, तो होती है बदनामी।

अक्सर समाज में हर जगह मिलती है बदनामी
बहारों में भी फूल की जगह खिलती है बदनामी
कोई बताये वो जगह, जहाँ होतीं ना बदनामी
जिधर देखो हर जुबान से निकलती है बदनामी।

कांटे नही उससे बढ़कर है सुई बदनामी
हवा से हल्की उड़ने वाली रुई बदनामी
जितना खुद को रोका बदनाम होने से
उतनी ज्यादा और अक्सर हुई बदनामी।

– राहुल रेड

Mehfil sja li yaron ki, to hue badnami
Bagiya khila libaharon ki to hue badnam
Yeh kesa smj hai jo badnaam krta firta hai
Madd kar di besharon ki to hue badnam

Kisi pe dil ye mar liya to hue badnami
Bahon me kisi ko bhr liya to hue badnami
Badnami k dor me bha kon hai bad man nahi
Kabhi pyar kisi se kar liya to hue badnami

Agar ajadi se ghoom liya to hue badnami
Mehfil me kabhi jhoom liya to hue badnami
Prem ko badnam kar diya jalimo ne etna
Matha jo uska chum liya to hue badnami

Roku kese yaron aaj hone se badnami
Syahi k kuch daag dhone se badnami
Jisko pa kar badnaam hi badnaam hua hoon
Chor du aggr sath use khone se badnami

Jab jyada ho pesa to hoti hai badnami
Cahe garib ho kesa to hoti hai badnami
Jab badnami ka daur hai fir main kese bachu
Ho insaan mere jesa to hoti hai badnami

Aksar smaj me har jagh milti hai badnami
Baharon me bhi ful ki jagh khilti hai badnami
Koi btaye wo jgh jha hoti na badnami
Jidhr dekho har jubann se niklti hai badnami

Kate nahi usse badkar hai sui badnami
Hwa se halki udne wali rue badnami
Jitna khud ko roka badnam hone se
Utni jyada aur aksr hue badnami

– Rahul Red

Hindi Poems on Time- रफ़्तार से


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चल रहा है वक्त धीमी रफ़्तार से
चल रही हूँ में धीमी रफ़्तार से
ना जाने क्यूँ चल रहा है वक़्त
ना जाने क्यूँ चल रही हूँ मैं
धीमी रफ़्तार से
ख़ुशी के वक़्त चलता वक़्त तेज़ रफ़्तार से
दर्द के वक़्त चलता वक़्त धीमी रफ़्तार से
शायद चल रहा है दर्द मेरे अंदर
धीमी रफ़्तार से
किसी ने पकड़ा था हाथ तो चल पड़ा वक़्त रफ़्तार से
छोड़ दिया उसने हाथ तो रुक गया वक़्त बिना बात के
वक़्त तो वो ही है और चल रहा वो अपनी रफ़्तार से
शायद मैं ही चल रही हूँ खुद अपनी रफ़्तार से
शायद मैं ही चल रही हूँ खुद अपनी रफ़्तार से

-मानसी गोयल

Chal raha hai waqt dheemi raftaar se…
Chal rahi hun me dheemi raftaar se…
Na jaane kyun chal rha h waqt…
Na jaane kyun chal rhi hun main
Dheemi raftaar se…..
Khushi ke waqt chalta waqt tez raftaar se…
Dard ke waqt chalta waqt dheemi raftaar se…
Shayad chal rha h dard mere andar
Dheemi raftaar se…
Kisi ne pakda tha hath toh chal pada waqt raftaar se…
Chhodh diya usne hath toh ruk gya waqt bina baat ke…
Waqt toh wo hi h or chal rha wo apni raftaar se
Shayad main hi chal rh hun khudh ki apni raftaar se…
Shayad main hi chal rh hun khudh ki apni raftaar se…

-Mansi Goyal

Hindi Poem On Freedom – उड़ान की शुरुआत


woman
लग रहा था  कि ये बात की शुरुआत होगी
पर क्या पता था की ये अंत की शुरुआत होगी
चलो शुरुआत  तो हुई , चाहे अंत की या शुरूआत  की
पिंजरे में कैद थी वो सोच रही थी फुर्र होने की
पर लगे उसके फड़फड़ाने ,हो गई शुरुआत उड़ान की
भरने लगी जब वो उड़ान तो उड़ ना सकी वो नादान
दम  तोड़ दिया उसने हो गई उसके अंत की शुरुआत
चाहे अंत की हो या उड़ान की
चाहे अंत की हो या उड़ान की
पर हो तो गई शुरुआत
 पर हो तो गई शुरुआत

-मानसी गोयल

Lag raha tha ki ye baat ki shruaat hogi…
par kya pta tha ki ye aant ki shruaat hogi…
chalo shruaat toh hui, chaahe aant ki ya shuruaat ki…
pinjade main kaid thi wo, soch rh thi furrr hone ki..
par lage uske phadfhadaane, ho gyi shruaat udaan ki…
bharne lagi jab wo udaan, toh udh na saki wo naadaan,
dam tod diya usne ho gyi uske aant ki shruaat…
chahe aant ki hui ho ya udaan ki…
chahe aant ki hui ho ya udaan ki…
par ho toh gyi shruaat…
par ho toh gyi shruaat..

-Mansi Goyal