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Hindi Poem on Motivation-Manzil


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मंज़िल
जो बढ़ा है ,अपना कदम आगे।
वो रुके ना किसी डर से पीछे।।
हमें हिम्मत से बढ़ना होगा।
नया आयाम फिर से घड़ना होगा।
ये मुश्किल कुछ पल की हट जायेगी।
हमे यकीं है, मंज़िल ज़रूर नज़र आएगी।।
-संजय

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Motivational Poem in Hindi-Himmat


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हिम्मत

हिम्मत खुद में पैदा कर ले,
हालातों से डटके लड़ ले।
तभी मिलेगा तुझको सकून,
कम न हो कुछ पाने का जनून।
हार गए जो खुद से ही,
पार नहीं पाओगे जग से।
नहीं पाओगे चैन कहीं भी
रखो तो तुम पग हिम्मत करके।
क्या जाने क्या माने जग को,
ये तो सदा ही डराता रहा सबको।
हिम्मत जिस में आ जाती हैं,
हार नहीं वो पाता, मंजिल करीब आती है।

-संजय कर्णवाल

Hindi Poem on Motivation-Chalta Chal


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चलता चल

ग़म छूपा हँसता चल
खुद को ही छलता चल ।

कदमों में है मंजिल
बस उम्मीदें करता चल ।

राहें तो हैं मुश्किल
हिम्मत कर बढ़ता चल ।

रो मत कायर बनकर
आँसू पी लड़ता चल ।

रौशन कर दिल की लौ
अन्दर से जलता चल ।
-अजय प्रसाद

टी जी टी इंग्लिश
डीऐवी पीएस पीजीसी बिहारशरीफ़
नालंदा, बिहार-८०३२१६

Hindi Poems on Life – अरमान


ये तुम्हारी कल्पना और बुद्धि का अंजाम है,
रास्ते हैं दो मगर वो एक ही पैगाम है ।
जब नहीं तुम जानते थे क्या ज़मीन क्या आसमान,
बंदगी जब थी नहीं क्यूं काफिरी बदनाम है।
आये थे जब वो तो आयी थी तुम्हारी इक किताब,
उससे पहले भी जहां में आदमी श्रीमान है।
उंगलियां अब मत उठाओ वक़्त का बदला मिज़ाज़,
था कभी वो वक़्त जब ज़िंदा चुना दीवार है।
कर दिया उसने कलम सिर बढ़ सकी न उसकी शान,
आज भी वो हम सभी के सीने में आबाद है।
मेरी नज़रों में सभी पैग़म्बरों की इक क़िताब,
मैंने देखी है ये गीता और वो कुरान है।
आदमी को आदमी से प्यार होना चाहिए,
इससे बढ़के बंदगी का न कोई फरमान है।
हम रहे या तुम रहो न कोई शिकवा न गिला,
फ़लसफ़ा इक हो ज़मीरी बस यही अरमान है।

– स्मृति तिवारी

Ye tumhari kalpana aur budhi ka anjaam hai
Raaste hai do magar wo ek hi pegaam hai
Jab nahi tum jante they kya jamin kya aasmaan
Bandgi jab thi nahi kyu kafiri badnaam hai
Aaye they jab woto aai thi tumhari ek kitab
Usse phale bhi aadmi jha me shrimaan hai
Ungliyaan ab mat uthao waqt ka badla mizaz hai
Tha kabhi wo waqt jab jinda chuna diwar hai
Kar diya usne kal seer badh saki na uski shaan
Aaj bhi wo hum sabhi ke sine me aabad hai
Meri nazron me sabhi pegambron ki ek kitab
Maine dekhi hai ye geeta aur ye kuran hai
Aadmi ko aadmi se pyar hona chahiye
Esse badke bandgi ka na koi farmaan hai
Hum rhe ya tum rho na koi shikwa na geela
Falsffa ek ho jamiri bs yhi armaan hai.

-Smriti Tiwari

Hindi Poems on Emotions – बदनामी


 

महफ़िल सजा ली यारों की, तो हुई बदनामी
बगिया खिला ली बहारों की, तो हुई बदनामी
यह कैसा समाज, जो बदनाम करता फिरता है?
मदद कर दी बेसहारों की, तो हुई बदनामी।

किसी पे दिल अगर ये मर लिया, तो हुई बदनामी
बाँहों में किसी को भर लिया, तो हुई बदनामी।
बदनामी के दौर में भला कौन है बदनाम नही?
कभी प्यार किसी से कर लिया, तो हुई बदनामी

अगर आजदी से घूम लिया, तो हुई बदनामी
महफ़िल में कभी झूम लिया, तो हुई बदनामी
प्रेम को बदनाम कर दिया जालिमो ने इतना
माथा जो उसका चूम लिया, तो हुई बदनामी।

रोकूँ कैसे यारों आज होने से बदनामी?
स्याही के कुछ दाग भी धोने से बदनामी
जिसको पाकर बदनाम ही बदनाम हुआ हूँ
छोड़ दूँ अगर साथ उसे खोने से बदनामी।

जब ज्यादा हो पैसा, तो होती है बदनामी
चाहें गरीब हो कैसा, तो होती है बदनामी
जब बदनामी का दौर है, फिर मैं कैसे बचूँ?
हो इन्शान मेरे जैसा, तो होती है बदनामी।

अक्सर समाज में हर जगह मिलती है बदनामी
बहारों में भी फूल की जगह खिलती है बदनामी
कोई बताये वो जगह, जहाँ होतीं ना बदनामी
जिधर देखो हर जुबान से निकलती है बदनामी।

कांटे नही उससे बढ़कर है सुई बदनामी
हवा से हल्की उड़ने वाली रुई बदनामी
जितना खुद को रोका बदनाम होने से
उतनी ज्यादा और अक्सर हुई बदनामी।

– राहुल रेड

Mehfil sja li yaron ki, to hue badnami
Bagiya khila libaharon ki to hue badnam
Yeh kesa smj hai jo badnaam krta firta hai
Madd kar di besharon ki to hue badnam

Kisi pe dil ye mar liya to hue badnami
Bahon me kisi ko bhr liya to hue badnami
Badnami k dor me bha kon hai bad man nahi
Kabhi pyar kisi se kar liya to hue badnami

Agar ajadi se ghoom liya to hue badnami
Mehfil me kabhi jhoom liya to hue badnami
Prem ko badnam kar diya jalimo ne etna
Matha jo uska chum liya to hue badnami

Roku kese yaron aaj hone se badnami
Syahi k kuch daag dhone se badnami
Jisko pa kar badnaam hi badnaam hua hoon
Chor du aggr sath use khone se badnami

Jab jyada ho pesa to hoti hai badnami
Cahe garib ho kesa to hoti hai badnami
Jab badnami ka daur hai fir main kese bachu
Ho insaan mere jesa to hoti hai badnami

Aksar smaj me har jagh milti hai badnami
Baharon me bhi ful ki jagh khilti hai badnami
Koi btaye wo jgh jha hoti na badnami
Jidhr dekho har jubann se niklti hai badnami

Kate nahi usse badkar hai sui badnami
Hwa se halki udne wali rue badnami
Jitna khud ko roka badnam hone se
Utni jyada aur aksr hue badnami

– Rahul Red