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Hindi Poem on Childhood-बचपन


बचपन दोपहर की कड़ी धूप में नंगे पाँव दौड़ जाना
जब गांव की गलियों को सरपट नाप आना
खेल खेल में यारो से दुश्मन सा लड़ जाना
कट्टी बट्टी के सिस्टम से सारे झगड़े निपटाना
वो मासूम सी शरारते,वो बेख़ौफ़ सी जिंदगी जाने कहाँ रह गयी,
जाने कहाँ रह गयी स्कूल न जाने के अनसुने बहाने ,
जाते थे कक्षा में चीखने चिल्लाने रेत के टीलों पर महल बनाकर ,
खुश होते थे कितना हम बेगाने नन्हे पैरो के वो बड़े होंसले,
चढ़ते थे पेड़ो पर आम खाने नीम के पत्तो को ज़मीं में छुपाकर,
सीखे थे हमने पैसे बनाने वो नादानियाँ,
वो शैतानिया वो अनगिनत बचखानिया जाने कहाँ रह गयी,
जाने कहाँ रह गयी वो कंचि,गीली डंडा और खो खो का खेल
वो गली क्रिकेट,सतोलिया और पेलमपेल सक्रांति की पतंगलूट
और मंझे के झोलमेल वो लंगड़ी टांग, साँपसीढ़ी, लूडो और रेल
वो सन्नाटा वो शोर,वो बेखुदी का दौर वो कटती पतंग की डोर,
वो खूबसूरत भोर, जाने कहाँ रह गयी, जाने कहाँ रह गयी
वो बैर तोड़ते कांटे चुभ जाना, वो इमली खाके दाँत बजाना
वो साइकिल सीखते गिर जाना वो मिटटी में सनकर घर जाना
बारिश में झूम झूम कर नहाना वो तीखी सी डाँट,
और रो जाना वो दादी नानी से रात-२बतियाना वो चोट की निशानिया
वो सच्ची सी कहानिया वो भोली सी शैतानिया वो मस्ती की रवानियाँ
जाने कहाँ रह गयी, जाने कहाँ रह गयी

-जीत

Bachpan dophar ki kadi dhoop mein nange paanv daud jana
Jab gaon ki galiyon ko sarpat naap aana
Khel khel mein yaaron se dushman sa lad jana
Katti batti ke system me sare jhgade niptana
Wo masoom si shararte, wo bekhof si zindagi jane kahan rah gayi
Jane kahan  rah gye school na jane ke ansune bahane
Jate they kaksh me chikhne chilane reit ke tilo me
Mahal bna ke tilon par mahal bnakar
Khush hote they kitna hum begaane nanhe peiron ke wo bade honslein
Chadte they pedon par aam kahne neem ke paton ko jami main chupakar
Sikhe they hamne pese bnanne wo nadaniyon
Wo shtaniya wo anginat bachkhaniya jane kahan  rah gayi
Jane kahan  rah gai wo kanchi,gili danda aur kho kho ka khel
Wo gali criket,stoliya aur peilmpeil sankrati ki patangloot
Aur manjhe ke jholmal wo langdi taang saanpsidi ,ludo aur rail
Wo sanaata wo shor,wo bekhudi ka dor wo katti patang ki dor
Wo khubsurat bhor jane kahan rah gayi jane kha rah gai
Wo beir todte kanta chub jana,wo emli kahan  ke daant bjana
Wo cycle sikhte gir jana wo mitti me sunkar ghar jana
Barish mein jhoom jhoom kar nhana wo tikhi si dant
Aur ro jana wo dadi nani se raat raat batiyana wo chot ki nishaniya
Wo sachi si khaniyaan wo bholi si shtaniya wo masti ki rawaniyaan
Jane kahan rah gai jane kahan rah gayi

-Jeet

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Hindi Poems on Childhood Memories- कभी मिलना उन गलियों में


कभी मिलना उन गलियों में
जहाँ छुप्पन-छुपाई में हमनें रात जगाई थी
जहाँ गुड्डे-गुड़ियों की शादी में
दोस्तों की बारात बुलाई थी
जहाँ स्कूल खत्म होते ही अपनी हँसी-ठिठोली की
अनगिनत महफिलें सजाई थी
जहाँ पिकनिक मनाने के लिए
अपने ही घर से न जाने कितनी ही चीज़ें चुराई थी
जहाँ हर खुशी हर ग़म में दोस्तों से
गले मिलने के लिए धर्म और जात की दीवारें गिराई थी
कई दफे यूँ ही उदास हुए तो दोस्तों ने
वक़्त बे वक़्त जुगनू पकड़ के जश्न मनाई थी
जब गया कोई दोस्त वो गली छोड़ के तो
याद में आँखों को महीनों रुलाई थी गली अब भी वही है
पर वो वक़्त नहीं, वो दोस्त नहीं हरे घास थे
जहाँ वहाँ बस काई उग आई है।

-सलिल सरोज

Kabhi milna un galiyon me kha
Chupan-chupai me hamne raat jgai thi
Jhan gude-guddiyon ki shadi mein
Doston ki barat bulai thi
Jhan school khtam hote hi apni hasi thitholi ki
Anginat mehfeele sjai thi
Jhan piknik mnanane ke liye
Apne hi ghar se na jane kitni hi chie churai thi
Jhan har khushi har gum mein doston se
Gale milne ke liye dharm aur jaat ki diware girai thi
Kai dafe yoon hi udas huye to doston ne
Waqt ve waqt jugnu pakad ke jashan mnai thi
Jab gya ki dost wo gali chod ke to
yaad mein aankhon ko mhino rulai thi gali ab abhi wahi hai
Par wo waqt nahi wo dost nahi hare ghas the
Jjhan whan bas koi uag aai hai

-Salil saroj