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Hindi Poem for Women – नारी शक्ति

 

नारी सिर्फ उपभोग की वस्तु है
ऐसे विचार कभी क़बूल मत करना
नारी को अबला समझने की  कभी भूल मत करना
नारी अम्बर है कोई शीशे की दिवार नहीं
नारी खुद में शक्ति है किसी की मोहताज़ नहीं
संघर्षो से टकराना उसको भी आता है
हर मुश्क़िल  से गुजर जाना उसको भी आता है
प्यार से देखोगें तो बहार नज़र आयेगी
नफरत से तोड़ोगे दीवार नज़र आयेगी

– साहिन मनसोरी

Nari sirf upbhog ki vastu hai
Aise vichar kabhi qabol mt karna
Nari ko abla samajhane ki kabhi bhul mat karna
Nari ambar hai koi shise ki divar nahi
Nari khud mein Shakti Hai kisi ki mauhtaaz nahi
Sangharshon se takrana ushko bhi aata Hai
Har mushkil se gujar Jana ushko bhi aata hai
Pyaar se dekhoge to bahaar nazar aayegi
Nafrat se todoge to deewar nazar aayegi

-Sahin mansory

Hindi Poem for Women – समानता

अंदर से रोती फिर भी बाहर से हँसती है
बार-बार जूड़े से बिखरे बालों को कसती है
शादी होती है उसकी या वो बिक जाती है
शौक,सहेली,आजादी मायके में छुट जाती है
फटी हुई एड़ियों को साड़ी से ढँकती है
खुद से ज्यादा वो दुसरो का ख्याल रखती है
सब उस पर अधिकार जमाते वो सबसे डरती है
क्योंकि बिकी हुई औरत बगावत नही करती है।

शादी हकोर लड़की जब ससुराल में जाती है
भूलकर वो मायका घर अपना बसाती है
घर आँगन खुशियो से भरते जब वो घर में आती है
सबको खाना खिलाकर फिर खुद खाती है
जो घर संभाले तो सबकी जिंदगी सम्भल जाती है
लड़की शादी के बाद कितनी बदल जाती है।
गले में गुलामी का मंगलसूत्र लटक जाता है
सिर से उसका पल्लू गिरे तो सबको खटक जाता है
अक्सर वो ससुराल की बदहाली में सड़ती है
क्योंकि बिकी हुई औरत बगावत नही करती है।

आखिर क्यों बिक जाती, औरत इस समाज में?
क्यों डर-डर के बोलती, गुलामी की आवाज में?
गुलामी में जागती हैं, गुलामी में सोती हैं
दहेज़ की वजह से हत्याएँ जिनकी होती हैं
जीना उसका चार दीवारो में उसी में वो मरती है
क्योंकि बिकी हुई औरत बगावत नही करती है।

जिस दिन सीख जायेगी वो हक़ की आवाज उठाना
उस दिन मिल जायेगा उसे सपनो का ठिकाना
खुद बदलो समाज बदलेगा वो दिन भी आएगा
जब पूरा ससुराल तुम्हारे साथ बैठकर खाना खायेगा
लेकिन आजादी का मतलब भी तुम भूल मत जाना
आजादी समानता है ना की शासन चलाना
असमानता के चुंगल में नारी जो फँस जाती है
तानाशाही का शासन वो घर में चलाती है
समानता से खाओ समानता से पियो
समानता के रहो समानता से जियो
असमानता वाले घरों की, एक ही पहचान होती है
या तो पुरुष प्रधान होता या महिला प्रधान होती है
रूढ़िवादी घर की नारी आज भी गुलाम है
दिन भर मशीन की तरह पड़ता उन पे काम है
दुःखों के पहाड़ से वो झरने की तरह झरती है
क्योंकि बिकी हुई औरत बगावत नही करती है।

-राहुल रेड