Category Archives: Hindi Poem on Poverty

Hindi Poem on an Old Lady Rag-picker: Pagal Budhiya


पागल बुढिया 

बालों के झोपें से क्या वो परेशान नहीं होती,
सड़क के किनारें रोज चलते कचरा बीनते,
नजर पड़ती है मुझ जैसे हजारों की उस पर,
क्या किसी की नजरें उस पर तंग परेशान नहीं होती,
क्या बात है आखिर उन बूढी आंखों में,
एक ना सिकन है चेहरे पर,
ताज्जुब उसे कभी यूं भटकते थकान नहीं होती,
कैसे निष्ठुर पीढी बना रहे है साहेब,
उम्र गुजारी जिसने हमारा आज लिखने को,
फुटपाथ पर उसके नंगे पैरों में जान नहीं होती,
रोज उसी सडक के किनारें हतप्रभ हो जाती हूं,
आखिर उसके हौसले के सामने खामोश हो जाती हूं,
हम बदल गये हैं, हमारी रफ्तारें तेज हो गयी हैं,
बडी खुदमिजाज है, कहती हाथ फैलाये जिदंगी पार नहीं होती,
ये लो कोई कहता कमसिन बुढिया, कोई कचरे बाली बुढिया,
हम तथाकथित शिक्षित पीढी की अम्मा कहने की बात नहीं होती,
गुजर कर कल को ये हालात कमतर नहीं होगें,
आज वो कल कोई और, कोई समझे तो ये हालात ना होती,
बालों के झोपें से क्या वो परेशान नहीं होती,
काश! उसके सवालों का मैं कोई जवाब होती!!!

डाॅ. अवन्तिका शेखावत

Advertisements

Hindi Poem on Poverty-गरीबों को भी इन्सान मान लो


ग़रीबी को एक पहचान मान लो,
अमीरों के हंसने का सामान मान लो,
और अगर भर गया हो मन मज़ाक से,
तो यार ग़रीबों को भी इन्सान मान लो,
ख़्वाबों मे उनके एक डर है जो छुपाना है,
बच्चों की फीस, माँ की दवा की कश्मकश का सब फ़साना है,
बावजूद इसके आँखों में जो स्वाभिमान एक पुराना है,
शायद उनके जीने का बस एक यही ठिकाना है,
अगर मुमकिन हो सके तो कभी उनका हाल जान लो,
यार ग़रीबों को भी इन्सान मान लो,
ज़िन्दगी में इनके बहुत रिश्तेदार नहीं,
ग़रीबों के ग़रीब भी यार नहीं,
बाक़ी बचा बस एक ख़ुदा पे ऐतबार था,
पर शायद भगवान को भी इनसे प्यार नहीं,
इन ग़रीबों को ख़ुदा की तरबियत जान लो,
इन गरीबों को भी तो इन्सान मान लो

-अतुल मणि त्रिपाठी

Garibi ko ek pehchaan maan lo
Amiron ke hasne ka saman maan lo
Aur agar bhar gya ho man mjak se
To yaar garibon ko insaan maan lo
Khwabon mein unke ek dar hai jo chupana hai
Bachon ki fees, maa ki dawa ki kashmkash ka sab fasana hai
Babjud eske aankhon mein jo swabhimaan ek purana hai
Sayad unke jine ka bas ek yahi thikana hai
Agar mumkin ho sake to kabhi unka haal jaan lo
Yaar garibon ko bhi insaan maan lo
Zinadagi mein enke bhut ristedaar nahi
Garibon ke garib bhi yaar nahi
Baki bacha bas ek khuda pe etbaar tha
Par sayd bhagwaan ko bhi ense pyar nahi
In garibon ko khuda ki tabiyat jaan lo
In garibon ko bhi to insaan maan lo

-Atul Manni Tripathi

Hindi Poems on Philosophy-वो बेदर्द हवेली


अक्सर गुजरना होता है ,मेरा उस हवेली से
मन भर आता है मेरा , उस पहेली से !
न जाने कितने लोग इसमे मजदूर होगे
वे पेट भरने को बडे़ मजबूर होगें :
रूक जाते हैं अनायास ही मेरे कदम ,
उस हवेली के आगे दिख जाते है
वो मजदूर मुझे रातो के जागे , लगता है
वो सारा जला हुआ भात खाते है मगर ……
ज़िन्दगी में कुछ नहीं मिला तो यही मात खाते है
उन लोगो पर किया हर कर्म भारी है
उनके पीढी दर पीढी यहीं मरने का प्रयास जारी है,
निरन्तर हो रहा है उनका शोषण
नही मिलता हैं उनके बच्चो को पोषण |
उनके बच्चे शिक्षा से भी वंचित है
क्योंकि उन अन्दर भी वही मजदूरी का रक्त संचित है ,
उन बच्चों की आँखें सारी- सारी रात रोती है
गरीबी की उस चाँदनी मे चमकते मोती है |
मन भर आता है मेरा इसी पहेली से ,
अक्सर गुजरना होता है मेरा उस ” बेदर्द हवेली से “……..

-अार.कुलदीप व्यास

Aksar gujarna hota hai mera us haveli se
Man bhar aata hai mera, us haveli se
Na jane kitne log esme majdur honge
Ve peit bharne ko bade majbur honge
Ruk jate hai anayaas hi mere kadam
Us heveli ke aage dikha jate hai
Wo majdur muje raaton ke jage ,lagta hai
Lagta hai wo sara jala hua bhaat khate hai magar
Zindagi me kuch nai mila to yahi maat khate hai
Un logo par kiya har karm bhari hai
Unke pidhi dar pidhi yahi marne ka pryaas jari hai
Nirntarn ho rha hai unka shoshan
Nahi milta hai une bachon ko poshan
Unke bache shikhsha se bhi vanchit hai
Kyoki unke andar wahi majduri ka raqat sanchit hai
Un bacho ki aankhe sari sari raat roti hai
Garibi ki us chandni me chamkte moti hai
Man bhar aata hai mera esi pheli se

-R.Kuldeep Vyas

Hindi Poem on Poverty – ग़रीबी


children-205223_960_720

आज निकल के घर से बाहर गया,
तो देखा उन दीन-दुखियारो को,
नन्हे हाथो मे खाली कटोरी,
और नयनो से निकलते अश्रु धारो को।
जिन्हे देख हृदय पसीज गया,
मन मेरा बेबस हो गया ,
उनके हाथो के सिक्को को सुन,
आज मैं तो संगीत भूल गया।
जिन्हे देख सहसा मैं ठहरा,
मानो कुछ देर अमीर मैं बन गया,
उन्हे देकर चंद सिक्के मैं,
उनकी दुआओ से गरीब मैं बन गया।

-नीरज चौरसिया

Aaj nikal k ghr se bahar gya
Too dekha un din-dukhiyon ko
Nanhe hathon me khali ktori
Aur nano se nikle ashru ki dharo ko
Jinhe dekh hirdya psij gya
Man mera bebas ho gya
Unke hatho k sikko ko sun
Aaj main to sangeet bhl gya
Jinhe dekh sahsa main thahra
Mano kuch deir amir main bn gya
Unhe de kr chand sikke main 
Unki duaao se grib main ban gya

– Niraj Chaurasiya