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Hindi Diwas Poem-Hindi Hindustan

हिन्दी-हिन्दुस्तान (कविता का शीर्षक)

हिन्दी-हिन्दुस्तान आगाज़ हूँ
मैं सच्चा अच्छा सा नाम हूँ,
परवाज़ हूँ मैं पक्का,
पक्का तमाम हूँ,
मुझसे हुई है महफ़िल
रोशनसरा यहाँ,
हिंदी है मेरी भाषा
मैं हिंदुस्तान हूँ।
हिंदी है मेरी…………
पक्का मिलूं कभी मैं,
कभी कच्चा मकान हूँ,
मिटा नहीं जो अबतक
ऐसा निशान हूँ,
कायम रखी है मैंने
रिवायाते दोस्ती,
दुनियां की भीड़ में भी,
तेरी ही शान हूँ,
हिंदी है मेरी…………
करते सभी हैं सारे
ऐसा मैं काम हूँ,
घंटी कहीं हूँ मैं
कहीं देखो अज़ान हूँ,
मुझमें बसी है यादें
किरदारे ज़ौक़ की,
मैं आन हूँ मैं इज्जत,
मैं इम्तिहान हूँ।
हिंदी है मेरी…………
मालूम है मुझे
कि मैं सख्त जान हूँ,
मुश्किल कहीं हूँ मैं
कहीं बिलकुल आसान हूँ,
करता हूँ रोज़ बातें
इज़हारे ख़ौफ़ की,
मैं खास हूँ कहीं पर,
कहीं देखो तो आम हूँ।
हिंदी है मेरी…………

मो0 मुजीबुर्रहमान (कवि का नाम)

कवि का सन्देश:

हिन्दी दिवस विशेष

Hindi Hindustan (Poetry Title)

Hindi Hindustan Agaaz hu
Main saccha, accha se naam hu,
Parwaz hu main pakka,
Pakka tamaam hu,
Mujhse hui hai mehfil
Roshansara yahan,
Hindi hai meri bhasha
Main Hindustan hu.
Hindi hai meri…………
Pakka milu kabhi main,
Kabhi kacha makaan hu,
Mita nahi hai jo ab tak
Aisa nishaan hu,
Kayam rakhi hai maine
Rivayate dosti,
Duniya ki bheed mein bhi,
Teri hi shaan hu,
Hindi hai meri…………
Karte sabhi hain saare
Aisa main kaam hu,
Ghanti kahi hu main
Kahi dekho azaan hu,
Mujhmein basi hai yadein
Kidaare zok ki,
Main aan hu main izzat,
Main imtehaan hu.
Hindi hai meri…………
Maloom hai mujhe
Ki main sakht jaan hu,
Mushkil kahi hu main
Kahi bilkul asaan hu,
Karta hoo roz batein
Izhaare khof ki,
Main khas hu kahi par,
Kahi dekho to aam hu.
Hindi hai meri…………

Moh. Mujeebur Rahman

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Poem on Hindi Language-Hindi Matrabhasha

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हिंदी मातृभाषा

हिंदी मातृभाषा है ये अभिमान मेरा है,
इसे पंक्तिबद्ध करना ही अरमान मेरा है।
कवि का कर्म लेखन है, कवि का धर्म लेखन है,
जो दिल से समझे ये दुनिया कवि का मर्म लेखन है।
मेरा कवि हृदय भी भाव विभोर हो उठता है,
जब अपने दिल के भावों को पृष्ठों में उकेर देता है।
हिंदी मातृभाषा है……….
इसे पंक्तिबद्ध करना ही………
तुक छंद के मेरी मातृभाषा में सुरभित हैं,
अलंकारों की रमणीयता से ये शोभित है।
एक-एक शब्द एक -एक मोती की चमक देता है,जब उसका अपना एक प्यारा सा अर्थ होता है।
अर्थहीन नहीं मेरी भाषा ये सटीक सार्थक है,
इसको पढ़ना और सीखना नहीं निरर्थक है।
सम्पूर्ण विश्व में ये पैैगाम देना है,
मेरी मातृभाषा को सम्मान देना है।
हिंदी………
इसे पंक्तिबद्ध करना….
हिंदी मातृभाषा से जो ये मेरा जन्म का बंधन है,
मै तो बंध गई इसमें कितना प्यारा मेरा जीवन है।
कब कविता निकली मुख से कब स्याही से मोती सी जड़ गई पृष्ठ पर ,
ये सब मातृभाषा के कारण है।
मातृभाषा की सुन्दरता कितनी अविरल है,
हिंदी माँ मेरी कितनी निश्छल है।
हिंदी मातृभाषा है ये अभिमान मेरा है,
इसे पंक्तिबद्ध करना ही अरमान मेरा है।

-कविता यादव