Category Archives: Hindi Poems on Emotions

Hindi Poem on Identity Crisis-Kaun Hoon Main


कौन हूँ मैं
आग हूँ आगाज़ हूँ खुद की गलती छुपाने वाला राज़ हूँ
झूठा हूँ फ़रेबी हूँ कल से डरने वाला आज हूँ
ज़िंदा हूँ मैं ज़िन्दगी में खुद में ही बेतहशा हूँ
सपना हूँ मैं आगे का आज का ज़िंदा लाश हूँ
लम्हा हूँ में बीते कल का आज का बुरा ख्वाब हूँ
गर्मी की धुप सर्दी की छाँव अपने मंज़िल के विपरीत पाव हूँ मैं
उत्तर हूँ मैं आगे का आज का प्रश्न चिन्ह हूँ
धीमा हूँ ज़िन्दगी मैं कल के धावक के लिए तैयार हूँ
गलती हूँ मैं पीछे का आज का नया इंसान हूँ
आग हूँ आगाज़ हूँ खुद की गलती मिटाने वाला आज हूँ !

-बबलू नाथ

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Hindi Poem On Self Improvement – खो कर अपने आप को


खो कर अपने आप को क्या कोई दूर जा पाया है
झूठे नाम के ख़ातिर ख़ुद को भुलाया है
ऐ बन्दे समझ तू अपनी असलियत को
ईस्वर तुझे इस संसार के लिये बनाया है
जो गुज़र गया है उसमे खुद को तूने समझाया है
आने वाली कल की चिंता ने आज को जलाया है
क्यों समझ नहीं आता इन प्यारे बुद्धि जीवियों को
की परमात्मा ने सब इसी पल के लिये बनाया है
बेबस हो रहा है पर खुद को  ना शक्तिशाली बनाया है
हो रही मुश्क़िलों को औरों वजह बताया है
एक काम जो तू वर्षो से टालता आया है
जरा रुक ! और देख ईश्वर ने तुझे एक ख़ासियत से बनाया है

– नवनीत कुमार तिवारी

Khokar apne aap ko Kya Koi door jaa paya hai,
Jhuthe naam ke khatir khud ko bhulaya hai
Ae bande samajh tu apni asaliyat ko,
Eswar ne tujhe iss sansar ke liye banaya hai.
Jo guzar Gaya hai usme khud ko tune samaya hai,
Aane wali Kal ki chinta ne aaj ko jalaya hai,
Kyo samajh nahi aata inn pyare budhhijiviyon ko,
Ki parmaatma ne sab isi pal ke liye banaya hai.
Bebas ho Raha hai par khud kp na shaktishali banaya hai,
Ho Rahi mushkilon ko auron ki wajah bataya hai,
Ek Kam Jo tu varso se talta aaya hai ,
Jara rukk! Aur dekh eswar ne tujhe ek khashiyat se bunaya hai..

-Navneet Kumar Tiwari

Hindi Poems on Emotions-अनजान


पक्के मकान और कच्ची ईंटे ,
सच्चे मोती और झूठे  बोल ,
ख्वाहिशों के धागे को दिखावे की सुई से सीकर चल रहे है।
घर शमशान की राख पर नहीं बनना चाहिए ,
मगर उसी मिट्ठी के बन रहे है।
बड़े आँगन की चाह में झोपड़ी उखाड़ी ,
धूप से परदों की ओंठ में छिप रहे है।
चला जा रहा है कारवाँ रामायण का पाठ करवा कर ,
मगर खुद अपने रावण के दहन से बच रहे है।

-प्रभ पूरी

Pakke Makan Or Kacchi Inte ,
Sacche Moti Or Juthe Bol ,
Khawahiso Ke Dhage Ko Dikhave Ki Sui Se Sikar Chal Rhe Hai …
Ghar Samsaan Ki Raakh Par Nhi Banna Chahiye ,
Magar Usi Mitthi Ke Ban Rhe Hai .
Bade Aagan Ki Chah me Jopadi Ukhaadi ,
Dhoop Se Pardo ki Onth me Chip Rhe Hai .
Chala Ja Rha Hai Karwa Ramayan Ka Paath Karwa Kar ,
Magar Khud Apne Ravan Ke Dehan Se Bach Rhe Hai ..

-Prabh Purii

Hindi Poems on Childhood Memories- कभी मिलना उन गलियों में


कभी मिलना उन गलियों में
जहाँ छुप्पन-छुपाई में हमनें रात जगाई थी
जहाँ गुड्डे-गुड़ियों की शादी में
दोस्तों की बारात बुलाई थी
जहाँ स्कूल खत्म होते ही अपनी हँसी-ठिठोली की
अनगिनत महफिलें सजाई थी
जहाँ पिकनिक मनाने के लिए
अपने ही घर से न जाने कितनी ही चीज़ें चुराई थी
जहाँ हर खुशी हर ग़म में दोस्तों से
गले मिलने के लिए धर्म और जात की दीवारें गिराई थी
कई दफे यूँ ही उदास हुए तो दोस्तों ने
वक़्त बे वक़्त जुगनू पकड़ के जश्न मनाई थी
जब गया कोई दोस्त वो गली छोड़ के तो
याद में आँखों को महीनों रुलाई थी गली अब भी वही है
पर वो वक़्त नहीं, वो दोस्त नहीं हरे घास थे
जहाँ वहाँ बस काई उग आई है।

-सलिल सरोज

Kabhi milna un galiyon me kha
Chupan-chupai me hamne raat jgai thi
Jhan gude-guddiyon ki shadi mein
Doston ki barat bulai thi
Jhan school khtam hote hi apni hasi thitholi ki
Anginat mehfeele sjai thi
Jhan piknik mnanane ke liye
Apne hi ghar se na jane kitni hi chie churai thi
Jhan har khushi har gum mein doston se
Gale milne ke liye dharm aur jaat ki diware girai thi
Kai dafe yoon hi udas huye to doston ne
Waqt ve waqt jugnu pakad ke jashan mnai thi
Jab gya ki dost wo gali chod ke to
yaad mein aankhon ko mhino rulai thi gali ab abhi wahi hai
Par wo waqt nahi wo dost nahi hare ghas the
Jjhan whan bas koi uag aai hai

-Salil saroj

Hindi Poems on Life – अरमान


ये तुम्हारी कल्पना और बुद्धि का अंजाम है,
रास्ते हैं दो मगर वो एक ही पैगाम है ।
जब नहीं तुम जानते थे क्या ज़मीन क्या आसमान,
बंदगी जब थी नहीं क्यूं काफिरी बदनाम है।
आये थे जब वो तो आयी थी तुम्हारी इक किताब,
उससे पहले भी जहां में आदमी श्रीमान है।
उंगलियां अब मत उठाओ वक़्त का बदला मिज़ाज़,
था कभी वो वक़्त जब ज़िंदा चुना दीवार है।
कर दिया उसने कलम सिर बढ़ सकी न उसकी शान,
आज भी वो हम सभी के सीने में आबाद है।
मेरी नज़रों में सभी पैग़म्बरों की इक क़िताब,
मैंने देखी है ये गीता और वो कुरान है।
आदमी को आदमी से प्यार होना चाहिए,
इससे बढ़के बंदगी का न कोई फरमान है।
हम रहे या तुम रहो न कोई शिकवा न गिला,
फ़लसफ़ा इक हो ज़मीरी बस यही अरमान है।

– स्मृति तिवारी

Ye tumhari kalpana aur budhi ka anjaam hai
Raaste hai do magar wo ek hi pegaam hai
Jab nahi tum jante they kya jamin kya aasmaan
Bandgi jab thi nahi kyu kafiri badnaam hai
Aaye they jab woto aai thi tumhari ek kitab
Usse phale bhi aadmi jha me shrimaan hai
Ungliyaan ab mat uthao waqt ka badla mizaz hai
Tha kabhi wo waqt jab jinda chuna diwar hai
Kar diya usne kal seer badh saki na uski shaan
Aaj bhi wo hum sabhi ke sine me aabad hai
Meri nazron me sabhi pegambron ki ek kitab
Maine dekhi hai ye geeta aur ye kuran hai
Aadmi ko aadmi se pyar hona chahiye
Esse badke bandgi ka na koi farmaan hai
Hum rhe ya tum rho na koi shikwa na geela
Falsffa ek ho jamiri bs yhi armaan hai.

-Smriti Tiwari