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Hindi Poem on Greatness of Mother-Aisi Kyo Hai Tu Maa

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people-3065370_960_720आखिर ऐसी क्यों है तू माँ..

घर से बाहर जाते वक़्त
तेरी आँखों से न ओझल हो जाऊँ मैं
उस हलक तक मुझे निहारती रहती है तू
आखिर ऐसी क्यों है तू माँ…।

तेरे टूट जाने में ही मेरा बनना तय था
फिर भी बेशर्म-सा उग रहा था मैं
और ख़ुशी-ख़ुशी ढ़ल रही थी तू
आखिर ऐसी क्यों है तू माँ…।

याद है वो दिन मुझे जब घर में
खाने वाले पांच और रोटी के टुकड़े थे चार
तब ‘मुझे भूख नहीं है’ ऐसा कहने वाली थी तू
आखिर ऐसी क्यों है तू माँ…।

आज सबकुछ बदला-बदला नज़र आता है
फिर भी इस कैल्कुलेटरमूलक दुनिया में
न बदलने वाली सिर्फ एक ही शख़्स है तू
आखिर ऐसी क्यों है तू माँ…।

कुदरत के उस सरल करिश्में को सलाम
जिसका अक्स मैं खुद में पाता हूँ
अपना सबकुछ त्याग कर भी मुझे अपनी
प्रतिकृति होने का आभास कराती है तू
आखिर ऐसी क्यों है तू माँ…।

हमेशा शिकवा रहेगा मुझे तुझसे यह कि
क्यों तू हमेशा लुटाती रही और मैं रहा लूटता
फिर भी शिकन तक नहीं तेरे माथे पर किंचित
आखिर ऐसी क्यों है तू माँ…।

  • © मीना रोहित (आयकर अधिकारी , दिल्ली)
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Hindi Poem on an Old Lady Rag-picker: Pagal Budhiya

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पागल बुढिया 

बालों के झोपें से क्या वो परेशान नहीं होती,
सड़क के किनारें रोज चलते कचरा बीनते,
नजर पड़ती है मुझ जैसे हजारों की उस पर,
क्या किसी की नजरें उस पर तंग परेशान नहीं होती,
क्या बात है आखिर उन बूढी आंखों में,
एक ना सिकन है चेहरे पर,
ताज्जुब उसे कभी यूं भटकते थकान नहीं होती,
कैसे निष्ठुर पीढी बना रहे है साहेब,
उम्र गुजारी जिसने हमारा आज लिखने को,
फुटपाथ पर उसके नंगे पैरों में जान नहीं होती,
रोज उसी सडक के किनारें हतप्रभ हो जाती हूं,
आखिर उसके हौसले के सामने खामोश हो जाती हूं,
हम बदल गये हैं, हमारी रफ्तारें तेज हो गयी हैं,
बडी खुदमिजाज है, कहती हाथ फैलाये जिदंगी पार नहीं होती,
ये लो कोई कहता कमसिन बुढिया, कोई कचरे बाली बुढिया,
हम तथाकथित शिक्षित पीढी की अम्मा कहने की बात नहीं होती,
गुजर कर कल को ये हालात कमतर नहीं होगें,
आज वो कल कोई और, कोई समझे तो ये हालात ना होती,
बालों के झोपें से क्या वो परेशान नहीं होती,
काश! उसके सवालों का मैं कोई जवाब होती!!!

डाॅ. अवन्तिका शेखावत

Hindi Poems on Motivation-तू लड़ तो सही मेरे यार

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तू लड़ तो सही मेरे यार
तू होगा सफल मेरे यार
खुद पर भरोसा रख
तू होगा सफल मेरे यार
ये जुनून जो बीतर है,
उसको बहार तो ला मेरे यार
सब कुछ फतेह करेगा तू
बस लड़ तो सही मेरे यार
किस बात का डर है यार
तू भाहर तो निकल यार
तू फौलादी सीना है
सब को दिखा दे यार
तू लड़ तो सही मेरे यार
अब पीछे नहीं जाना है
बस आगे बढ़ना है
मंजिल पाकर अब वापस आना है यार
बस तू लड़ तो सही मेरे यार

-अनुभव मिश्रा

Tu lad to sahi mere yaar
Tu hoga safal mere yaar
Khud pa bharosa rakh
Tu hoga safal mere yaar
Ye janoon jo bhitar hai
Usko bahar to laa mere yaar
Sab kuch fatah karega tu
Bas lad to sahi mere yaar
Kis baat ka dar hai yaar
Tu bahar to nikal yaar
Tu fauladi sina hai
Sab ko dikha de yaar
Tu lad to sahi mere yaar
Ab piche nahi jana hai
Bas aage badna hai
Manjil pa kar ab bapis aana hai yaar
Bas u lad to sahi mere yaar

-Anubhav Mishra

Hindi Poems on Life-ज़िन्दगी का खेल

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ज़िन्दगी का खेल निराला है
दुख सुख का पिटारा है
एक बात समझ में आ गई
पैसों का ही बोलबाला है यहां
खुशी भी पैसों से खरीदी जाती है
ओर गम भी पैसों की कमी से आता है
लड़ लेते हैं लोग अपनो से तब
कोई रिश्ता समझ नहीं आता है
ना जाने कितनो की ज़िन्दगीयो से
खेलेगा ये कागज का टुकड़ा
क्या बदलेगी ये दुनिया या फिर
मुझे बदलना होगा
सोच रही हूँ कब से
अब क्या करना होगा ? ?

-नेहा कुमारी

Zindagi ka khel nirala hai
Dukh sukh ka pitara hai
Ek baat smajh mein aa gayi
Paiso ka bolbala hai yhan
Khushi bhi paiso se kharidi jati hai
Aur gam bhi paiso ki kaam se aata hai
Lad lete hai log apno se tab
Koi rishta smajh nahi aata hai
Na jane kitno ki zindagiyon se
Khelega ye kagaz ka tukda
Kya badlegi ye duniya ya fir
Mujhe badalna hoga
Soch rahi hoon kab se
Ab kya karna hoga

-Neha kumari

Hindi Poem on Sad Girl – एक लड़की

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आँखों को मूँदे
बैठी हैं कोने में  “वो”
कभी आंसू आए
तो कभी मुस्कुराये  “वो”
रिश्तों को निभाए
अपने आप में मस्त
दिल की परतों को खोले
पर राज़ गहरे छुपाएं हैं  “वो”
एकान्त में अकेली नहीं हैं  “वो”
दोस्त हैं गहरे अंधेरे में
जिसे देख न सके कोई
भीड़ में खड़ी
पर अकेली हैं आज भी  “वो”
– सुमिता कँवर

Aankhon ko mundein
Bethi kone mein wo
Kabhi aansu aaye
To kabhi muskuraye wo
Riston ko nibhaye
Apne aap mein mast
Dil ki parton ko khole
Par raaz gahre chupaye hai wo
Ekant me akeli nahi hai wo
Dost hai gahre andhere mein
Jise dekh na sake koi
Bheed mein khadi
Par akeli hai aaj bhi wo
-Sumita Kanwar