Citizenship Amendment Bill (2019)

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Hindi Poem on Duty of Citizens- Hum-Aap Nagrik Hain

हम-आप नागरिक हैं (कविता का शीर्षक)
आओ अपना संविधानिक फ़र्ज़ निभाते हैं,
कर्तव्यों का हमें नहीं पता, पर हम आम नागरिक हैं ,
हमें भला कौन रोकेगा ?
सरकारे हैं ना चलो उन पर दोष लगाते हैं ।
आओ आज अपना संविधानिक फर्ज निभाते हैं।।
सुनो, पुलिस जो आए तो उसे भी ना छोड़ना ,
क्योंकि हमारा काम है बस सरकारों को दोष देना ,
दिल्ली ही तो है, फिर बस जायगी पर अगर शान्ति रही तो देश मे मानवता ना फैल जायगी।।
पत्थर मे पथरबाज़ी में भला कश्मीर ही क्यों आगे रहे ?
हम हैं ना, चलो किसी की दुकान तो किसी का घर जलाते है ।
चलो आज अपना फ़र्ज़ निभाते हैं,
चलो आज फिर से सरकारों को दोषी ठहराते हैं।।
हममें से कुछ मुसलमान होंगे, कुछ हिन्दू होंगे ,
कुछ पक्ष मे होंगे, कुछ विपशी होंगे,
अरे ये सी ऐ ऐ क्या है, तुम्हें पता है क्या ?
पर चलो बहुत दिन गये शान्ति के, अब ये जो बिंदु मिला है
इसी बहाने कुछ उपद्रव मचाते हैं ,
चलो सरकारों को दोषी ठहराते है,
हम आम नागरिक है, चलो ज़रा अपना फ़र्ज़ निभाते हैं।।
सुना है महमानों को बुलाया जा रहा है देश में,
चलो उनको तो अपने संस्कार दिखाते हैं ।
अभी तो मरने वालों की संख्या बत्तीस हुई है
चलो पचास के पार पहुँचाते हैं ,
किसी का बाप छिने, किसी का सुहाग हमें भला क्या लेना
हम देश प्रेमी है गलत के खिलाफ आवाज़ ही तो उठाते हैं ।
चलो आज अपना फ़र्ज़ निभाते हैं,
हम तो आम नागरिक हैं, हमें कौन रोकेगा,
हम ही तो सरकार बनाते हैं ।
आओ आज उन्ही सरकारों को दोषी ठहराते हैं।।

  • आकांक्षा देशवाल

Hindi Poem on Citizenship Amendment Act 2019 (नागरिकता संशोधन कानून 2019)-Kaun Kasoorvar

कौन कसूरवार

ये जो गलियां कल तक झूम रहीं थी,
आज ना जाने क्यों चुप हैं।
सड़के बस तन्हा सी चली जा रही
जाने इनको कौन सा दुख है ।
ये कैसा सन्नाटा छाया है ?
ये कैसा समय अब आया है?
कौन बतायेगा हमें,
कहीं से कुछ लोग मिले
जो कुछ-कुछ कहने लगे
किसी ने कहा “सुना नहीं
क्या हुआ इस मुहल्ले में?”
“अरे! उन बच्चों की चीखें
कैसे नहीं सुनी तुमने”
“हाहाकार की आवाज़ें तो गूंज उठी थी”
पर मैंने तो कुछ सुना नहीं
“बेचारे अनाथ बच्चे थे”
“बहुत मारा उन्हें उन्होंने “
“कौन से बच्चे, किसने मारा, क्यों मारा ?”
मेरे सवाल से वो सहम गए और कहा
“तुमने नहीं सुना तो हमें भी नहीं पता “
विनती और कई वादों के बाद पता चला
जो सच,उसने तो दिल छलनी कर दिया
धर्म की राजनीति ने मासूमों को पीटा
और साथ दिया कानून के रखवालों ने
पर उन बच्चों ने किया क्या था
“कुछ नहीं बस मुल्लों के घर पैदा हुए थे”
तो किसी ने उन्हें बचाया क्यों नहीं
कौन बचाता? बचाने वाले तो मार रहे थे
उन मासूमों को ठीक ही मिली सज़ा
उनका गुनाह था ही इतना बड़ा
होगा बड़ा बने का दहशतगर्द
मर जाये तो कम होगा सर दर्द
कहाँ से लाएंगे वो सबूत भारतीय होने का?
पर किसी ने नहीं माँगा सबूत उनके देश भक्ति का
सोचा मैंने वो साबित करना कठिन है बड़ा
एक अनाथ कहा से लाएगा बाप दादा
“मर गए सब या है बचा कोई?”
“नहीं नहीं मरा कोई नहीं
चोटिल हैं पर बच गए सभी”
“जीवित है क्या यही है काफी? “
“नहीं तो क्या दीजियेगा गुनाहगारों को फांसी”
कह कर ये वो हंसने लगे,
ना किसी ने कुछ किया, ना कर सकता है।
मैंने भी सबकी तरह हाथ बांधे और बढ़ गया।
रास्ते में आए पत्थरों से बचकर निकल पढ़ा।।

-सामरा मैमून उस्मानी

English meaning for international readers:

The poet expresses plight over the condition of young students who were beaten severely during protests against Citizenship Amendment Bill (CAB) 2019 solely based on their religion (Muslims). The poetry is based on the current state of affairs in India with a large section of youth opposing the CAB.