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Publish Your Poems

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28 thoughts on “Publish Your Poems”

  1. Rajat kumar said:

    Meri Adhuri kahani written by me its very little poem
    Meri zindagi ki khuli kitab ho tum
    Mere zeene ka ehsaas ho tum
    Mere liye ek pyara sa gulab ko tum
    Jo hamesha khushbuu deta rehta hai
    Tum haste ho to aisa lagta hai jaise sari khusiyan mil gye mujhe
    Tere pyar me iskadar doob jaata hu ki din pata lagta hai Na hi shaam
    Meri liye har ek se jyaada khaas ho tum
    Meri zindagi ki khuli kitaab ho tum
    Meri zindagi ki Roshni ho tum
    Mere liye gulaab se bhi pyare ho tum
    Jab jab tumhe dekhta hu Mujhe aur pyar ho jata hai
    Mere liye Pyari si Muraat ho tum
    chaand se bhi pyari Surat ho tum
    Bhut se Rango se Rangi Tasveer ho tum
    Mere liye khuli kitaab ho tum

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  2. YAAD RAKHNA SADA
    Hota Jo bas mein , Aaye mere lal, Kar detee yeh dunia , Saaree tere naam, Toad laatee Chand tare , Bhi tere lye , Magar hain seemayen bahut , Kya main karoon , Nahi Kuch pass mere, Duaaon ke siva. Na hogee kamee, Unme kabhi, Bhar doongee unse , Jholiyan teree. ,dunia ki Har khushi, Tujh ko mile Jee bhar ke Hanse tu, Num meree aankh ho, Har Maa ke Dil ki aasheesh hai , Raho muskurate, Khilkhilate raho , Tapken Na aansoon , Na dukh hi kabhi , Aas pass ho , Sukh dukh to hain, sayon ki Terhan , kabi raat andheree , Kabi suprabhat hai , Khona Na dheeraj , YAAD RAKHNA SADA , Sunta hai WOH , Jisne khel Sara rachaya , Dil Maa ka bhi , Usee ne banaya, Hai tumhari khushi mein, Khushi mere Dil ki SADA YAAD RAKHNA Bat mere Dil ki .

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  3. Kiran Kapur Gulati said:

    ए ज़िन्दगी तेरे चेहरे हज़ार
    हंसाएं कभी तो कभी रुलाये ज़ार ज़ार
    समझना तुझे आसान नहीं,
    कहीं होती है रुखसत,
    तो कहीं लाती है बहार
    दिखाती है कभी वीराणिओ के आसार,
    तूफानों से भी कभी करती है पार
    दे देती है कभी अश्क़ बेशुमार,
    लुटती है कभी प्यार ही प्यार
    कभी रह जाती हैं हसरते कई,
    कहाँ आता है फिर ज़िन्दगी में खुमार.
    खेतए रहते हैं कश्ती,
    की उतरेंगे पार
    ले जाती है कहीं और
    हमें उमंगों की धार.
    हो जाता है खड़ा कभी बेडा मंझधार,
    और खेने को नहीं मिलता पटवार.
    ए ज़िन्दगी तेरे चेहरे हज़ार
    बीते पलों पैर न था इख़्तियार,
    आने वाले पलों का रहता इन्तिज़ार.
    बीत जाता है जीवन, हो जैसी बहार,
    नहीं आता कभी जीवन में करार.
    रहे कभी तमन्नाओं से दिल गुलज़ार,
    वह खिलाये फूल फिर बेशुमार.
    यह चाहतों राहतों काहै बाजार,
    फिर भी चैन नहीं होता शुमार.
    बहारों का हर पल रहता इन्तिज़ार,
    पलों ही पलों में खो जाता संसार
    ए ज़िन्दगी तेरे चेहरे
    कभी हंसाएं तो कभी रुलाये ज़ार ज़ार

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  4. Riddhi Asthana said:

    नाम है नरेंद्र दामोदर दास मोदी , हैं वह देश के मंत्री प्रधान,
    जो चले हैं बढाने दुनिया में भारत की आन, बान और शान|

    आये जबसे मोदी सत्ता में, दौड गई नई उम्मीद की लहर.
    एक अकेले बन्दे ने बरपा दिया सभी पाटिॅयों पर कहर|

    आते ही सरकार में शुरू कर दी नई योजनायें,
    दूर होने लगी जिससे गांवों में बिजली पानी की समस्यायें|

    विदेशों से आकर यहाँ नेताआें नें मोदी से मिलाया हाथ,
    तो जाकर वहाँ मोदी ने भी खूब selfie खींची सबके साथ|

    गये जिस देश भी मोदी कुछ न कुछ लेकर ही आऐ,
    जिससे वह 125 करोड़ देशवासियों के कल को बेहतर बनायें|

    शुरु किया FDI, Make In India और Skill India Development,
    भारत को एक दिन विकसित बनायेगा मोदी का यही Management.

    मोदी ने दुनिया में भारत का नाम बहुत कराया,
    खुश होकर शेख ने UAE में मंदिर का भरोसा दिलाया|

    BY- RIDDHI ASTHANA

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  5. Metropolitan Zindagi :

    ————————————————————————————————
    Darwaze ki hur dastak ko darkinar karna shaheriyon ki aadat si ho gayi hai !!
    Aksar kismat bhi ghanti maar maar ke laut jati hai pareshan hokar
    Aur kabhi khuda milne aaya to use bhi wapas jana pada waqt khokar

    Subah aur sham ka manzar ek sa hi lagta hai
    Bahar kisi ke hone ya na hone se furk bhi kya padta hai
    Wo kyun jee rahe hai darbon mein band kabootaron ki tarah
    Kya pankh unke bhool gaye hain udne ki kala

    Doosron ke kaam aane ko wo sauda galat maan gaye
    Rub ki banai duniya ko “bakwas” aur uske hur bande ko “begana” bata gaye
    Bade din baad bahar deekhe lekin bina dua salam ke hi phir munh banake andar chale gaye
    Aur kyunkar na kare kyunkiiii 🙂
    Darwaze ki hur dastak ko darkinar karna shaheriyon ki aadat si ho gayi hai !!
    ———————————————————————————————————————

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  6. Game of time / Waqt ka khel :
    ————————————————

    Kyun zindagi mein waqt
    sakht itna ho jata hai
    Gum ki barsake barish
    sazish tak kar jata hai

    Jab waqt kare barbad
    yaad tab hi aata hai daata
    Dukh mein doobe bande ka
    jud jata hai rab se nata

    Sukh ke pul mein bhi na bhula
    bula us ishwar ko khush hoke
    Waqt ki bhi kya bisaat
    ki uski marzi ko toke

    ————————————————-

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  7. Hi Anushka,

    Thanks a lot for publishing my poem “Metropolitan zindagi” with some good alterations.

    Today i have sent another poem “Game of time / Waqt ka khel”.
    Please have a look if it can have a place on your nice website.

    Regards,
    Niveta

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  8. Wo aaye hmari jindagi mai is tarah.
    ki muje mujse he mila diya..
    hamne pocha us se ki kya nouchaavar kre tuj pe.
    to aake usne dheeme se mere kaano mai kha..
    maa muje sirf tu chaiye jindagi ke liye…

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  9. Kyun zindagi mein waqt
    sakht itna ho jata hai
    Gum ki barsake barish
    sazish tak kar jata hai

    Jab waqt kare barbad
    yaad tab hi aata hai daata
    Dukh mein doobe bande ka
    jud jata hai rab se nata

    Sukh ke pul mein bhi na bhula
    bula us ishwar ko khush hoke
    Waqt ki bhi kya bisaat
    ki uski marzi ko toke

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  10. Mai Q Na Chahun

    Itni aabadi me rahna aajadi se,
    mai q na chahun.
    Panchiyon si udkar badlon ko chuna
    mai q na chahun.
    Ladkon sa mai bhi har jagah ghumna,
    Taron se alag chand ki tarah chamakana,
    mai q na chahun.
    Parwaton ka aarohan sapna bane mera,
    Videshon me jakar padhna mai q na chahun.
    In sare sawalon ke jawab mai q na chahun.
    Janta hai aasman aur jamin
    hamme nahi hai koi kami,
    Phir q itni aabadi me rahna aajadi se,
    Mai q na chahun.

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  11. Deepak Kulshrestha said:

    This is a poem describing the situation where a couple has separated & one of them is celebrating birthday alone hence missing other partner. Hope you like it.

    सालगिरह

    सालगिरह आती रही,
    सालगिरह जाती रही,
    पर ना खोल सका उन गिरहों को कोई
    जो वक़्त ने बाँध रक्खी थीं,
    ऐसा क्या ओर क्यों कर था
    कि उनका सिरा भी ना मिला?
    शायद वो सिरे कहीं दूर थे,
    हमारी अपनी पहुँच से दूर,
    बहुत दूर अनंत में गढ़े हुए,
    या हमारे अपने हाथों की छाप में मढ़े हुए?
    कौन जाने ?
    जतन मैंने भी किये बेहिसाब,
    चाहा तुमने भी बहुत,
    पर शायद वक़्त ने सराहा ही नहीं,
    वरना क्या वजह हो सकती थी
    कि ज़िन्दगी भर साथ चलने के बावजूद
    हम किनारों की तरह किनारों पर ही रहे ?
    एक किनारा तेरा था,
    एक किनारा मेरा भी,
    शायद वक़्त ही ठीक से बाँधना भूल गया था
    सप्तपदी की गिरह को,
    या भूल गया था कोई ऐसी गिरह
    जो दोनों किनारों को बाँध पाती,
    या दोनों को ले जाकर
    छोड़ देता किसी सागर में?
    शायद मिल ही जाती वजह
    हमें अगली सालगिरह के इंतज़ार की !
    *****

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  12. sarvesh kumar marut said:

    दीर्घ पथ पर एक अबला ,अपने क्षण को काट रही थी।
    नेत्र बुझे उसके दोनों थे,शायद आँखोँ में प्यास रही थी।
    नभ में अवतरित मेघ काले थे,मन मन में कुछ फुसफुसा रही थी।
    सफर कटा अब कटता ही चला,मृत्यु भी तो समीप ना आ रही थी।
    शायद दोपहर का पहर था वह,धूप नहीं वर्षा आ रही थी।
    तीव्र गति से मेघों के झुण्ड,झटपट झटपट वर्षा रही थी।
    वह तो पहले ही मर रही थी,वर्षा उसकी पीड़ा और बढ़ा रही थी।
    तन अधीर पट विक्षीण थे,किसी तरह बिछौने से लिपटा रही थी।
    दीर्घ राह से निकले सब थे,लोगों ने देखा पर ना पुकार रही थी।
    वर्षा वर्षा वर्षा घनघोर घटा से,आँखों में प्यास पर ना प्यास रही थी।
    मौत के रास्ते हुए कई हैं,शायद वही पथ तलाश रही थी।
    मौत बन रही सौत उसे थी,जो उसे अति प्रताड़ित कर रही थी।
    मन्नते माँगी उसने कितनीं,मृत्यु उसके पास आने से शर्मा रही थी।
    शरीर जीर्ण पद घायल थे,श्वासों से शीत वायु बहा रही थी।
    एक आध ही दृष्टि पड़ी थी,लगता था जैसे वह मर रही थी।
    लगता था मुझको कुछ ऐसा,मृत्यु भी जनों की भाँति घृणा कर रही थी।
    जीवित रखता है वह सबको ,वह मरती मरती जी रही थी।
    सब की होती ख़्वाहिशें व्यापक,पर वह व्यापक मृत्यु बुला रही थी।
    महसूस करूँ तो ऐसा लगता,मृत्यु तो फ़रमान ही ना सुना रही थी।
    पर मृत्यु उसके पास कड़ी थी, वह मृत्यु के समीप मृत्यु उससे दूर जा रही थी।
    दीर्घ पथ पर एक अबला , अपने क्षण को काट रही थी।
    सर्वेश कुमार मारुत

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  13. Sarvesh Kumar Marut said:

    हे वीर जवानों! तुम सब कुछ हो,
    फ़िर इस जग में और क्या है?
    तुम से ही तो देश का अस्तित्त्व रहा,
    तुम बिन इस जग में क्या नया है?
    जियो चराचर तुम भारत के वीरों,
    हम सब जन की उमर लग जाये।
    शत-शत नमन करे हम सब तो,
    प्यारे वीर जवान अमर हो जाये।
    सर्वेश कुमार मारुत

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  14. Sarvesh Kumar Marut said:

    वृक्ष हमारे जीवन साथी,
    इसके बिन घट जाये बाती।
    शुद्ध हवा इससे ही आती,
    सांसों में हमारे है जाती।
    हे इंसानों! सुन लो-सुन लो,
    वरना हो जायेगी बर्बादी।
    सर्वेश कुमार मारुत

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  15. Sarvesh Kumar Marut said:

    धरती को हम न तड़पाये,
    वृक्ष न काटे और न कटवाये।
    चाहते हैं खुशिहाली अगर हम,
    वृक्षों को हम खूब लगाये।
    सर्वेश कुमार मारुत

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  16. sarvesh kumar marut said:

    बसन्त का मौसम जब आता है,
                         साथ नई खुशियाँ लाता है।
    देख इसे तब मानव ही क्या ?,
                         जड़ चेतन को भी लहलहाता है।
    हुए थे पतझड़ से घायल ये,
                         नई जान सी लाता है।
    खेत खलिहान हरित हो चले,
                         सारे जग को महकाता है।
    फ़ूट चुकीं अब कलियाँ,दल पात्र,
                         तब धूप में जग चिलकाता है।
    बसन्त का मौसम जब आता है,
                          साथ नई खुशियाँ लाता है।
    मस्त पवन भी धीरे-धीरे,
                          तब सारे जग को सहलाता है।
    उड़ी-उड़ी लो मधु मधुरस लेकर,
                         और तितली के मन को हर्षाता है।
    सुगन्ध महकती धीमे-धीमे,
                          यह मन को हमारे मचलाता है।
    शाखा तो अब बाल्य हो चलीं,
                         और पत्ता पत्ते से तब टकराता है।
    यौवनित हो चले झाड़ पात वन,
                         श्रृंगरित हो शर्माता है।
    अब आ गये देखो प्रेम पुजारी,
                        आँचल तब उनका रह न पाता है।
    बसन्त का मौसम जब आता है,
                          साथ नई खुशियाँ लाता है।
    दूषित वसन तब टूट चले थे,
                          बस ठूँठ बने लजियाता है।
    फटे चिरे क्षीण थे ऐसे,
                         वह अम्बर या गेह पथ पर गिर जाता है।
    कोई आये या कोई गुज़रे,
                         तब कोई दया दृष्टि या काट गिराता है।
    पर महिमा है न्यारी उसकी,
                        देख परिस्थिति वसन्त भेज दिया जाता है,
    मानव क्यों व्याकुल सा फ़िरता ,
                       आग लगी-लगी बस मन समझाता है।
    सखी घूमती चली बावली,
                       प्रेम प्रताड़ित यह आग और बढ़ाता है।
    बसन्त का मौसम जब आता है,
                         साथ नई खुशियाँ लाता है।
                          सर्वेश कुमार मारुत

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  17. sarvesh kumar marut said:

    घनघोर घटा से बादल काले,
    मस्त लगे और कितने प्यारे
    देख के बादल काले काले।
    कड़-कड़-कड़-कड़ बिजली चमके,
    और घूमते कैसे यह मतवाले?
    धुँआ-धुँआ सा छाया कैसे?
    आग लगी हो मानो जैसे।
    सूरज राजा छिपे अब डरे-डरे,
    उसे देख खग भी टहले,
    वे बच्चों को घोंसले में लगे बैठाने।
    चेतक उन्हें देख अपने मुख को,
    ऊपर करके लगा फैलाने।
    मयूर भी नाच उठे देखो हैं,
    देख के बादल काले-काले।
    बरसने लगे ऐसे जैसे,
    फूट पड़े हो अंगारे।
    धुँध छा चला है ऐसे ,
    डेरा डारे जैसे रात्रि रे।
    मानव चित्त था व्याकुल,
    वह थर थर लगा काँपने।
    दन्तों को वह मीसे ऐसे,
    और किट-किट कर लगा बजाने।
    शीत ऋतु के बादल काले,
    काले-काले और काले।
    मानव तब ठण्डक से बचने को,
    सब अग्नि लगे जलाने।
    गगन मंडल काला था वैसे,
    आग जली-जली जलने।
    पर वह हुए और पीले काले।
    टपक पड़े खण्डित छत छप्पर से,
    देख निवासी लगा मलमलाने।
    यहाँ देखते वहाँ देखते,
    कोशिश करें स्वयं को बचाने।
    ग्रीष्म ऋतु के बादल काले,
    काले-काले और काले।
    झड़े-झड़े कोहरे जैसे,
    रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम रे।
    निकले तभी सतरंगी राजा,
    पालकी में देखो सजे सजे।
    मेढ़क तालाबो में झूमे,
    तैरे मटके लगे टर्राने।
    घोंघा-घोंघी टकराये आपस में,
    खोले फाटक जोंके लगी बाहर आने।
    मछली की आँखे भर आई सी,
    लगी अपनी प्यास बुझाने।
    केकड़ा बेचैन हुआ था बैठा,
    काले-काले बादल देख लगा लंगड़ाने।
    जल वनस्पति लगी सज सँवरने,
    श्रृंगरित हो मन ही मन में,
    लगी गीत खुशी के गाने।
    भूमि भी अपने चुम्बन से,
    हर बूँद को लगी चूमने।
    तब चूमचाम के चूर हो चली,
    धरा का हृदय लगा घबराने।
    कठोरता से यह नम्र हो चली,
    आकृतियाँ भाँति-भाँति की लगी सजाने।
    वर्षा ऋतु के बादल काले ,
    काले-काले और काले।
    झपड़-झपड़ खूब छपाछप,
    घनघोर घटा से वर्षा रे।
    चौपायों के राज हो चले,
    जो गया पोखरों में लगा नहाने।
    हाँड़ माँस तब डूब चला रे,
    तब गर्दन ऊपर लगा उठाने।
    छाया हर तरफ़ वारि-वारि,
    मानो आईना लगा दिखाने।
    कहीं सरोज कुमुद या नलनी,
    यह यौवन को और लगा बढ़ाने।
    सजी हो नव दुल्हन बनी धरणी,
    और तम्बू बने हो बादल काले।
    बने बाराती नाच रहे हो,
    मयूर,मत्स्य,मेंढ़क,फ़ूल व अन्य सारे।
    और ढोल ढमाके बजा रहे,
    काली बिजुरी के नगारे।
    उनके ज़ोर नाच पड़े रे,
    मेघ घटा से काले काले।
    घनघोर घटा के बादल काले,
    काले-काले और काले।
    सर्वेश कुमार मारुत

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  18. Sarvesh Kumar Marut said:

    बसन्त का मौसम जब आता है,
                         साथ नई खुशियाँ लाता है।
    देख इसे तब मानव ही क्या ,
                         जड़ चेतन को भी लहलहाता है।
    हुए थे पतझड़ से घायल ये,
                         नई जान सी लाता है।
    खेत खलिहान हरित हो चले,
                         सारे जग को महकाता है।
    फ़ूट चुकीं अब कलियाँ,दल पात्र,
                         तब धूप में जग चिलकाता है।
    बसन्त का मौसम जब आता है,
                          साथ नई खुशियाँ लाता है।
    मस्त पवन भी धीरे-धीरे,
                          तब सारे जग को सहलाता है।
    उड़ी-उड़ी लो मधु मधुरस लेकर,
                         और तितली के मन को हर्षाता है।
    सुगन्ध महकती धीमे-धीमे,
                          यह मन को हमारे मचलाता है।
    शाखा तो अब बाल्य हो चलीं,
                         और पत्ता पत्ते से तब टकराता है।
    यौवनित हो चले झाड़ पात वन,
                         श्रृंगरित हो शर्माता है।
    अब आ गये देखो प्रेम पुजारी,
                        आँचल तब उनका रह न पाता है।
    बसन्त का मौसम जब आता है,
                          साथ नई खुशियाँ लाता है।
    दूषित वसन तब टूट चले थे,
                          बस ठूँठ बने लजियाता है।
    फटे चिरे क्षीण थे ऐसे,
                         वह अम्बर या गेह पथ पर गिर जाता है।
    कोई आये या कोई गुज़रे,
                         तब कोई दया दृष्टि या काट गिराता है।
    पर महिमा है न्यारी उसकी,
                        देख परिस्थिति वसन्त भेज दिया जाता है,
    मानव क्यों व्याकुल सा फ़िरता ,
                       आग लगी-लगी बस मन समझाता है।
    सखी घूमती चली बावली,
                       प्रेम प्रताड़ित यह आग और बढ़ाता है।
    बसन्त का मौसम जब आता है,
                         साथ नई खुशियाँ लाता है।
                          सर्वेश कुमार मारुत

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  19. क्षीण तन मन दुर्बल,
    अब काँटा बन चुका शरीर ।
    चली जा रही हो वह ऐसे,
    चली हों लहरें जिसके तीर।
    पग-पग पर करहाती ऐसे,
    छत्ते बिन मधुमक्खी जैसे।
    डगर छोटी चलती जा रही,
    जैसे चला हो पहली बार बलवीर।
    पथ-पथ पर वह देखे ऐसे,
    बिन मछली वक हुआ अधीर।
    हाथ फैलाए होंठ छिपाए वह चली जा रही,
    जैसे खड़ा हो मृत्य शरीर।
    हुआ प्रतीत तो होंठ हिले थे,
    पर दिया नहीं उन्होंने कुछ भी।
    क्या करती बस बढ़ती ही
    चली?,
    चली नदी हो जैसे सागर के नीर।
    पैरों में यह जख़्म ये ऐसा,
    जैसे गड्ढों की तस्वीर।
    चली जा रही चली जा
    रही,
    पर आँखों में थे उसके नीर।
    क्षीण तन मन दुर्बल,
    अब काँटा बन चुका शरीर ।
    चली जा रही हो वह ऐसे,
    चली हों लहरें जिसके तीर।
    तन पर पट फटे पड़ें हैं ,
    जैसे पतझड़ की तासीर।
    हाथ उठाए जैसे उसने ,
    पर महाशय बोले दो मुझको ढील।
    उसके साथ एक छोटा बालक,
    खिंचता जा रहा पकड़े उसकी
    उँगली।
    वह तो अम्मा अम्मा बोलता जा रहा,
    लग रहा था मानो टेढ़ी लकीर।
    एक हाथ से माँ की पकड़ी उँगली,
    तथा दूसरा हाथ था प्रकीर्ण।
    लोगो ने तभी देखा उधर से,
    और कर ली आँखें बड़ी-बड़ी।
    वह बोला बाबू दे दो कुछ,
    पर कह दिया उन्होंने चल आगे बढ़ ले।
    अब क्या करते व्ह बढ़ते ही चले?,
    और कहा रहो जीते प्यारे वीर।
    उसने मन में इतना सोचा,
    कुछ लोगों ने चोला पहना हमारे जैसा ही।
    इसकी खातिर लोगों ने हमें,
    झूठा समझ लिया पहले से ही।
    पर मिला अब नहीं-मिला अब नहीं,
    चाहें हम चले जाएँ लाखों मील।
    पर तन में इतनी क्षमता ही नहीं,
    और पैर पड़े हैं बिल्कुल चीर।
    क्षीण तन मन दुर्बल ,
    अब काँटा बन चुका शरीर।
    चली जा रही चली जा
    रही ,
    पड़ चुकी हैं जिनकी साँसें क्षीण।
    सर्वेश कुमार मारुत

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  20. Sarvesh Kumar Marut said:

    मछली- मछली इधर तो आ,
                          आकर अपना नाम बता।
    डर मत मछली आ भी जा,
                          और आकर के खाना खा जा।
    मछली-मछली मान भी जा,
                           हठ मत कर और न शर्मा।
    तुझको हाथ लगाऊँ मैं तो,
                          मुझको आये बड़ा मजा।
    मछली- मछली एक बात बता,
                          पानी से तेरा साथ बड़ा।
    और बिन पानी तेरा होगा क्या?
                          मैंने अब यह लिया है मान,
    पानी ही तेरा जीवन दान।
                          क्या करूँ मैं और बखान?
    बिन पानी तेरे निकले प्रान।
                                   सर्वेश कुमार मारुत

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  21. Sarvesh Kumar Marut said:

    हर कोई वेग़ाना है,
    सभी का अपना अपना फ़साना है।
    उलझते जा रहे फ़ासलों क्यों?
    ये वन्दा कुछ दीवाना है।
    ज़िन्दगी जीना चाहते हैं,
    ख़्वाहिशों का आशियां है।
    रुक चली ज़िन्दगी उलझती राहों में,
    पर हौंसलों का मुकां है।
    मासूमियत चेहरे पर है कितनीं?
    पर कहाँ चेहरे पर निशां है।
    जिसने तोड़े हैं सीने से पत्थर,
    न पहलवान पर वह इंसा है।
    पर जंग जीती ज़िन्दगी में जिसने,
    वो इंसान ही तो महान हैं।
    नहीं पोछा करते पसीने को अपने,
    क्योंकि पसीना ही उनकी जान है।
    ख़िलते आये हैं फ़ूल ऐसे ही में आज तक,
    ये सवक क़ाबिले वेमिशां है।
    सर्वेश कुमार मारुत

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  22. Sarvesh Kumar Marut said:

    चल-चला-चल, चल-चला-चल, तू चलता चल।
    ज़ीवन ही तो कठिनाई है, पर बढ़ता चल।
    चलना है तो चलना है ,तुझे हर पल-पल।
    छोटा जीवन करम नेक ,तो करता चल।
    चल-चला-चल, चल-चला-चल, तू चलता चल।
    कठिन रास्ते हैं ,पर कठिनाई से मत तू हिल।
    पड़े रास्ते कई ,तो अपनी मति-मति चल।
    कई रास्ते में से कोई तू एक पकड़ ,पर चलता चल।
    एक सूध तू बस पकड़ ले, निकलेगा तेरा हल।
    चल-चला-चल, चल-चला-चल, तू चलता चल।
    इस पथ पर कुछ नेक मिले, तो तू मिलकर चल।
    कुछ मिलेंगे भ्रष्ट, सुध दे और क्या बढ़ता चल?
    संकट पैदा करें, पर तू इनसे मत खल।
    लोग जले जलने दे, पर तू अनदेखा कर चल।
    चल-चला-चल, चल-चला-चल, तू चलता चल।
    तू चलेगा देश चलेगा, निकल सकता है हल।
    उन्नति ,समृद्धि तुम्हीं से, और इसे विकसित करता चल।
    तुम देश से – देश तुम से , तू और सुरक्षित करता चल।
    बूँद -बूँद से घड़ा भरा है , और इसे तू भरता चल।
    चल-चला-चल, चल-चला-चल, तू चलता चल।
    सर्वेश कुमार मारुत

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  23. Sarvesh Kumar Marut said:

    कविता प्रकाशन के लिए धन्यवाद;! मैडम

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