Category Archives: Abstract Poems

Hindi Poem on Life Struggle-Safar


सफ़र

सफ़र पर निकल पड़ो मन में संकल्प लेकर
चाहे अमावस की रात हो या पूनम का चांद
चाहे आये तुफान या तनी हों बन्दूकें
ना डरना है ना गिरना है ना भागना है
डरना क्यों आत्मविश्वास जब बलवान है
मुस्कुराके आगे बढ़ते रहो हिम्मत न हारो
असफलता एक चूनौती है, स्वीकार करो
नीद चैन को संघर्ष पथ पर, बलिहार करो
लगे रहो जब तक न सफलता साथ हो
हमेशा हर समय बस लक्ष्य की ही बात हो

-दीपान्जली
दीपा रामदास शिंपी नवसारी गुजरात
3/12/2019


Hindi Poem on Save Water-Swadeshi Ab Isko Thehralo


स्वदेशी अब इसको ठहरालो

जल-थल का है मोती,
मनु नहीं जलाता इसकी ज्योति |
जीवन चाहो तो बचालो,
स्वदेशी अब इसको ठहरालो ||
स्वप्न हो जायेगी ये खुशहाली,
क्यों चाहते हो ये बदहाली |
अब तो मानो यह अमृत जल,
स्वदेशी अब इसको ठहरालो ||
जल से जीवन का सुन्दर पल,
शाम-सुबह होता इसका उत्कल |
वित्त से नहीं मनोवृत्त से बचालो,
स्वदेशी अब इसको ठहरालो ||
कितना सुन्दर है इसका सूर,
नदियों में शुभ दिन छल-छल |
ध्यान दो इस पर पल दो पल,
स्वदेशी अब इसको ठहरालो ||
इस पर नहीं जो ध्यान दिया,
दुश्परिणामों में है नाम किया |
जीवन को अब तुम सवांर लो,
स्वदेशी अब इसको ठहरालो ||

-संदीप यादव

Swadeshi Ab Isko Thehralo

Jal-thal ka hai moti,

Manu nahin jalata iski jyoti

Jeevan chaho to bachalo ,

Swadeshi ab isko thaharalo.

Svapn ho jayegi ye khushahali,

Kyon chahate ho ye badhali.

Ab to mano amrit jal,

Swadeshi ab isko thaharalo

Jal se jeevan ka sundar pal,

Sham-subah hota isaka utkal.

Vitt se nahin manovritt se bachalo,

Swadeshi ab isko thaharalo

Kitana sundar hai isaka soor,

Nadiyon mein shubh din chhal-chhal

Dhyan do is par pal do pal,

Swadeshi ab isako thaharalo

Is par nahin jo dhyan diya,

To dushparinamo mein hai naam kiya

Jeevan ko ab tum savar lo,

Swaadeshi ab isko thaharalo

-Sandeep Yadav

English Translation:

The poet is urging his fellow countrymen to save water. He says that water is like a precious pearl and we must save it. If you do not take action on saving water today, your prosperity will become a dream. Why do you want to doom yourself? Save water! Pay attention to water crisis at the same very moment, that is today. We are already facing the consequences of our recklessness. Take the right step towards life, and start saving water!

Hindi Poem on Self-Betterment – Andar Baitha Ravan


अंदर बैठा रावण

जो सालों पहले ही मर गया, उसको हर बार जलाते हो,
मिनटों की शौखों की खातिर पैसा तुम व्यर्थ बहाते हो।
बुराई की पराजय का तुम क्यों ये ढोंग रचाते हो,
जो अंदर बैठा है छिप के, उसको क्यों भूल जाते हो।।

पूछो खुद से!! क्या खुशियाँ मनाने का यह एकमात्र तरीका है?
पूछो खुद से!! वायु मलिन कर खुशियाँ मनाना, क्या यह सुगम सलीका है?
पूछो खुद से!!

न किसि का बुरा करो और न ही कुछ गलत सहन करो,
जो करना है तो अंदर बैठे रावण का तुम दहन करो।।
बुराई पे अच्छाई की जीत के नाम पे, रावण दहन हर बार करोगे,
सच में अच्छाई तब जीतेगी, जब तुम जन जन से प्यार करोगे।।
छल जलन, निंदा कपट को मारो प्यारे,
मझधार में अटकी नईया, लग जाएगी आप किनारे।।

शान्तनु मिश्रा

Hindi Poem on Silence is Golden – Maun Aur Muskan


मौन और मुस्कान

मौन में अनंत शांति समायी है,
मुस्कान उस शांति की परछाई है,
गहरा रिश्ता है मौन का मुस्कान से
मैं सुनाता हूं सुनो ध्यान से,

मौन महल है तो मुस्कान द्वार है,
यहां पहुचने के रास्ते हज़ार हैं,
मौन भाव में स्थित होती है जब दृष्टि
तब मुस्कुराती नज़र आती है सम्पूर्ण सृष्टि

यहां हर कोई विचारों और वाक्यों में उलझा है,
मौन को जाना जिसने बस वही सुलझा है,
मौन कारण है तो मुस्कान प्रभाव है
वास्तव में यही तो हमारा स्वभाव है,

सम्पूर्ण सृष्टि मौन भाव में ही विचरती है
मुस्कुराती है अपना कार्य बखूबी करती है,
मुस्कान मौन से ही दिव्यता पाती है,
तभी तो ये मुख की शोभा बढा पाती है,

जब मन पा जाता है मौन अवस्था
तब समझ में आने लगती है सम्पूर्ण सृष्टि व्यवस्था,
मन मौन होने पर मनुष्य तब अचंभित होता है
मुस्कान बन तब उसमें मौन ही प्रतिबिंबित होता है…

-नवीन कौशिक

Hindi Poem on Grief -Pattey


पत्ते

टूट के बिखरी मैं भी हूँ
जैसे बिखरते है पत्ते शाखों से टूट कर।
रोज़ ज़माना मसल कर चला जाता है उन पत्तों को,
उन हज़ार पत्तों में एक पत्ता में भी तो हूँ।

इंतज़ार रहता है उस हवा के झोंके का
जो,कहीं दूर ले चले मुझे उसके साथ
अब मुझे यह रुसवाई चुभने लगी है।

-स्रेष्ठा

Tut ke bikhri mein bhi hoon
Jaise bikhar te hain patte sakho se tut kar.
Roz zamana masalkar chala jata hain un patto ko,
Un hazar patto mein ek patta mein bhi to hu

Intezar raheta hain us hawa ke jhooke ka
Jo, kahi dur le chale mujhe uske sath
Ab mujhe yeh ruswaa-e chubhne lagi hain.

Sreshtha