Category Archives: Abstract Poems

Hindi Poem on Life-Zindagi


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ज़िन्दगी सांसों की गुलाम क्यों है?
हुकूमतें सहती, सुबह शाम क्यों है?
हर लम्हा बताता है, हम हैं तो तुम हो
कैसे गुमान करें, ज़िन्दगी हैरान क्यों है?

अटकती है, चलती है, रुकती है कभी
भारी ज़िन्दगी पे खुले आम क्यों है?

-अविनाश

Zindagi sanson ki gulaam kyo hai?

Hukumatein sehti, subah-sham kyo hai?

Har lamha batata hai, ham hain to tum ho

Kaise gumaan karein, zindagi hairan kyo hai?

Atakti hai, chalti hai, rukti hai kabhi

Bhaari zindagi pe khule aam kyo hai?

-Avinash (Poet)

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Hindi Poem on Value of Time: Ehmiyat Waqt Ki


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अहमियत वक्त की

अहमियत वक्त की तब समझ आई
जब जीवन में ठोकर पर ठोकर खाई,
जब वक्त की कदर ही न की
तभी तो मुसीबतें भी जीवन में बिन बुलाए आई।
फिर तो हमेशा कहते रहे इधर कुआँ, उधर खाई,
अहमियत वक्त की तब समझ आई
जब जीवन में ठोकर पे ठोकर खाई।।

हर वक्त खुशियों की महफ़िल सजाई
पर एसी महफ़िल ही क्या
जिसमें वक्त की कीमत ही समझ न आई।
महफ़िल तो सजा दी हमने बेवक्त बेवजह
पर अंजाम की बात कभी अपने ज़हन में ना आई,
अहमियत वक्त की तब समझ आई
जब जीवन में ठोकर पर ठोकर खाई।।

-रोहित

Hindi Poem Encouraging Change-Badalte Zamaane Ke Sath


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बदलते ज़माने के साथ

बदलते ज़माने के साथ हम भी बदलते गए
जीवन में वक्त के साथ बदलते रंगो को जीवन में भरते गए।
ज़माने में हर तरह के लोग मिले
बस सब के साथ कदम मिलाकर आगे बढते गए
हमारी तो क्या औकात है
रास्ता तो ईश्वर ने दिखाया
बस हम तो उस पर चलते गए।
बदलते ज़माने के साथ हम भी बदलते गए,
बदलते ज़माने के साथ हम भी बदलते गए।।

बचपन की यादों को साथ लिए
हमने जवानी में कदम रखा है।
बचपन तो बीत गया खेल कूद में
अब तो वक्त ने भी अपना रुख बदल रखा है,
जीवन के हर मोड़ से बचपन हो या जवानी
हम तो बस सीखते चले गए
बदलते ज़माने के साथ हम भी बदलते गए,
बदलते ज़माने के साथ हम भी बदलते गए।।

-रोहित 

Hindi Poem on Tree Branch-Vallari


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वल्लरी

इठलाती बलखाती तरु सहारे अस्तित्व जताती
हरी-भरी एक वल्लरी कोमल पत्रों से थी ढंकी
आया बसंत खिल गया उपवन कली -कली हो गयी वल्लरी
सुरभि से सुरभित हुई पवन
सुर्ख पुष्प जब लगे महकने, सूर्य की रश्मि में लगे दमकने
शोभा ऐसी थी मनो प्रकृति नृत्य कर रही पल-पल
इठलाती बलखाती तरु सहारे अस्तित्व जताती
हरी-भरी एक वल्लरी कोमल पत्रों से थी ढंकी
प्राण संचित करती है पुष्प में, हर पत्र भी उससे पोषित
उसकी शोभा से तो था संपूर्ण उपवन शोभित
एक पुष्प ने की बगावत विलग हुआ वल्लरी से
होकर विलग गिरा धरा पर
मुरझाया खोया संपूर्ण सौंदर्य प्राण से भी हुआ विहीन
अस्तित्व पुष्प का था वल्लरी उसी से था उसका जीवन
इठलाती बलखाती तरु सहारे अस्तित्व जताती
हरी-भरी एक वल्लरी कोमल पत्रों से थी ढंकी

-कविता

Vallari

Ithlaati balkhati taru sahaare astitav jataati,
Hari-bhari ek vallari komal patro se thi dhanki.
Aaya basant khil gaya upwan kali kali ho gayi vallari,
Surbhi se surbhit huyi pawan.
Surkh pusp jab lage mahakne, surya ki rashmi me lage damakne.,
Shobha aisi thi maano prakriti nritya kr rahi pal pal…
Ithlaati balkhati taru sahaare astitav jataati,
Hari-bhari ek vallari komal patro se thi dhanki.
Praan sanchit karti har pushp me, har patr bhi usse poshit.
Uski shobha se to tha sampurna upwan shobhit..
Ek pushp ne ki bagaawat vilag hua vallri se,
Hokar vilag gira dharaa par,
Murjhaaya khoya sampurna soundarya praan se bhi hua viheen,
Astitav pushp ka thi vallari usi se tha uska jeewan…
Ithlaati balkhati taru sahaare astitav jataati,
Hari-bhari ek vallari komal patro se thi dhanki.

-Kavita

Story of an Honest Person-सबको नाखुश मैं रखता हूँ


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साल फिर से बदल रहा है,
आज भी एक साईकिल पर सवार हूँ,
अपनी जरूरतें अलग रख कर, घर की ज़रूरतें पहले पूरी करता हूँ,
फिर भी न जाने सबको नाखुश मैं रखता हूँ,

माना कि कड़वी है बोली मेरी,
अपने हो या पराया, सच बोलकर,
सिर्फ उनकी अच्छाई चाहता हूँ,
फिर भी न जाने सबको नाखुश मैं रखता हूँ,

कच्ची उम्र में छूटा पिता का साया,
इसलिए अपने हल्के से बुखार में डर जाता हूँ,
एक पिता का मतलब अच्छे से समझता हूँ,

सख्ती और अनुशासन भी रखता हूँ,
अगर रख दे वो (बच्चे) किसी पर हाथ,
तो उसे लाकर, उनकी मुस्कान भी बनता हूँ,
फिर भी न जाने सबको नाखुश मैं रखता हूँ,

हमेशा अपने उसूलों पर चला हूँ,
गलत को गलत, और
सही को सही बोलता हूँ,
जिससे सबकी आँखो में खलता हूँ,
इसलिए सबको नाखुश मैं रखता हूँ…

-तृप्ति शर्मा