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Hindi poem on India-देश का दुश्मन

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देश का दुश्मन वही नहीं होता है
जो सीमाओं पर हमला करता है
जो आतंक फैलाता है स्मगलिग करता है।
देश का दुश्मन वह भी होता है
जो विकास की फाईले लटकाता है
विकास के नाम पर गावों को उजाड़ता है
दवाओं के अभाव मे बच्चो को मारता है
शिक्षा -स्वास्थ्य के मौलिक हक को व्यापार बनाता है
युवाओ के हाथो से काम छीनता है
देशवासियो के जाति-धर्म के शब्द बीनता है

-पुलस्तेय 

Desh ka dushman vaahee nahin hota hai
Jo seemaon par hamala karata hai
jJo aatank phailata hai meglig karata hai
Desh ka dushman vah bhee hota hai
Jo vikaas kee phaeele latakaata hai
Vikaas ka naam par gaavon ko ujaadata hai
Davaon ke abhaav mein bachcha ko maarata hai
Shiksha-svasth ka mool hak ko vyaapaar banaata hai
Yuvaon ke haathon se kaam chheenate hain
Deshavaasiyon ke jaati-dharm ke shabd binata hai.

-Pulsatey

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Hindi Poems on Motivation -ज़िंदगी का सफर

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एक लंबा सफर है रोज़ चलते रहना होगा बिना थके, रुके
इस ज़िंदगी को जीना होगा मुश्किलों का सामना तो होता रहेगा
यदि सलामती चाहते हो तो लड़ना पड़ेगा ये एक जंग है
बंधू, ज़ख्म तो होंगे ही उन्हें नज़र अंदाज़ कर के आगे बढ़ना होगा
ज़िंदगी एक जंगल है परेशानी तो होगी सही राह पर चलते रहो
जीत तुम्हारी ही होगी ऐसे न रो बंधू, तुम्हे यह सहना होगा
परेशानी को नज़र अंदाज़ करके तुम्हे आगे बढ़ना होगा
दुःख भी मिलता है, खुशियां भी मिलती है
यह दोनों साये की तरह ज़िंदगी भर साथ चलती है
एक दिन रात ढलेगी, उजाले का बसेरा होगा बंधू आज उदास हो !
कल चेहरा खुशियों से भरा होगा गलतियां तो होंगी तुम्हे ही सुधारनी होगी
ज़िंदगी बहुत छोटी है तुम्हे बड़ी बनानी होगी
यह अभी बेरंग है, बेढंग है ज़िंदगी तुम्हे ही सवारनी होगी
काम बहुत बड़े बड़े है, मेहनत करनी होगी फिर क्या बंधू !
मंज़िल तुम्हारे सामने होगी किसी से नाराज़ न होना,
न गुस्सा करना बस परिश्रम के बल से मंज़िल की ओर बढ़ते रहना

-मोहम्मद उजैब

ek lamba safar hai roz chalte rhna hoga bina thake ruke
es zindgai ko jeena hoga mushkilo ka samna to hota rhega
yadi slamati chahte ho to ladana padega ye ek jang hai
bandu jkham to honge hi unhe nazar andaz kar ke aage badna hoga
zindagi ek jangal hai presani to hogi sahi raah par chalte raho
jeet tumhari hi hogi ese na ro bandu tumhe yeh sahana hoga
presani ko nazar andaz kar ke tumhe aage badna hoga
dukh bhi milta hai khushiyaan bhi milti hai
yeh dono saye ki tarh zindagi bhar sath chahlti hai
ek din raat dhlegi,ujale ka besera hoga bandu aaj udas ho
kal chehra khushoyon se bhra hoga galtiyan to hongi tumhe hi sudharni hogi
zindagi bhot choti hai tumhe hi bnani hogi
yeh abhi berang hai ,bedhang hai zindagi tumhe hi swarni hogi
kam bhut bade bade hai mehanat karni hogi fir kya bandu
manjil tumhare samne hogi kisi se naraz na hona
na gussa karna bas parisharm ke bal se manjil ki aur badte rehna

-Mohd Uzaib

Hindi Poems on Life- ज़िन्दगी के हर मोड़ पे

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ज़िन्दगी के हर मोड़ पे खिल खिला के चल रहा था।
छोटी छोटी ज़िन्दगी के लिए ज़िन्दगी से लड़ रहा था।।
वो भी अढ़ गया कि इसको हर राह पर आजमानी ह।
एक पल के लिए मै भी सोचा ये कैसी मन मानी है ।।
हर जगह नए सवालों के साथ वो तैयार था।
अपनी ही मन मानी में वो अयार था।।
देख लेना ज़िन्दगी एक दिन खुद ब खुद मरेगा ।
चुनौती देते देते कभी ना कभी तो वो थकेगा।।
ज़िन्दगी हर मोड़ पर मेरी परीक्षा ली रही थी ।
जोकि शायद सही था पर वो बेखबर था कि खुदा वहीं था।।

– निखिल

Zindagi ke har mod pe khil khila ke chal rha tha
Choti choti zindagi ke liye zindagi se lad rha tha
Wo bhi ad gya ki esko har raah par aajmani hai
Ek pal ke liye main bhi socha ye kesi manmani hai
Har jagah aye swalon ke sath wo tayar tha
Apni hi man mani mein wo ayar tha
Dekh lena zindagi ek din khud b khud marega
Chunauti dete dete kabhi na kabhi to wo thakega
Zindagi har mod par meri pariksha le rahi thi
Joki sayad sahi tha par wo bekhabar tha ki khuda wahi tha

– Nikhil

Hindi poem on India – आर्यावर्त का गौरव भारत

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भ्रमण करते ब्रह्मांड में असंख्य पिण्ड दक्षिणावर्त सुदुर दिखते
कहीं दृग में अन्य कोई वामावर्त हर विधा की नवीन कथा में
निश्चय आधार होता आवर्त सभी कर्मों की साक्षी रही है, पुण्य धरा हे आर्यावर्त !
यह पुण्य धरा वीरों की रही है प्रफुल्लता, नवसष्येष्टि सदा बही है
कोमलता ! लघुता कहाँ ? पूर्णता रही है ; आक्रांता उन्माद को प्रकृति ने बहुत सही है |
सत्य की संधान में विज्ञान अनुसंधान में विश्व – बंधुत्व कल्याण में,
करुणा दया की दान में नहीं अटूट अन्यत्र है योग और न ही ऐसा संयोग|
संसार में शुद्धता संचार में प्राणियों में पूर्णता से प्यार में योग,
आयुर्वेद व प्राकृतिक उपचार में भूमण्डल पर नहीं कोई जगत् उपकार में ;
ये केवल और केवल यहीं पे, आर्यावर्त की पुण्य मही पे !
जहाँ सभ्यता की शुरूआत हुई, हर ओर धरा पर
हरियाली ज्ञान- विज्ञान के सतत् सत्कर्म से फैली रहती थी
उजियाली, हर क्षेत्र होता पावन – पुरातन बच्चों से बूढों तक
खुशिहाली कुलिन लोग मिला करते परस्पर, जैसे प्रातः किरणों की लाली !
पर हाय! आज देखते भूगोल को नीति नियामक खगोल को ;
खंडित विघटित करवाया किसने , कर मानवता को तार- तार,
रक्त- रंजित नृत्य दिखाया किसने ! यह सोच सभी को खाती है
अब असत्य अधिक ना भाती है झुठलाया जिसने सत्य को दबाया
जो अधिपत्य को , इतिहास ना उन्हें छोड़ेगा , परख सत्य !
कहाँ मुख मोड़ेगा | आर्यावर्त का विघटित खंड, आज आक्रांताओं से घिरा भारत है;
शेष खंड खंडित जितने भी, घोर आतंक भूख से पीड़ित सतत् है |
मानवता के रक्षक जो अवशेष भूमी है प्राणप्रिय वसुंधरा ,
समेटी करूणा की नमी है; हर ओर फैलाती कण प्रफुल्लता की, धुंध जहाँ भी जमी है;
अनंत नमन करना वीरों यह, पावन दुर्लभ भारत भूमी है !
अखंड भारत अमर रहे !

~ कवि पं आलोक पान्डेय

Hindi poem on India – तुम लौट के अब न आना

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यहाँ बसते हैं सब धर्मों के इंसा
तुम घर सरहद पे बना लेना तहज़ीब
मेरे हिंदुस्तान की ज़रा उनको भी सिखा देना
आईना वो रखना साथ अपने इस पार जो देखें तो
उस पार चमक जाना खुशबू से
मेरे देश की मिट्टी की उनको भी महकना
भूख-प्यास हम सह लेंगे आन-शान तुमको हैं
बचना ये देश हैं वीरों का पीछे न तुम हट जाना
उम्मीद कम हो जब प्राण की तो मुस्कुराना
दिल के दर्द को होटो पे कभी न लाना टूट कर बिखर भी जाओ
अगर तुम ज़र्रा-ज़र्रा तो लौट के तुम न आना
तुम देश पे मर जाना हसरतें अह-ले-वतन की पूरी
तू करके जाना कफ़न तिरंगा हो तेरा लिपट के
उसमे आना तुम देश पे मर जाना,तुम देश पे मर जाना।।

-सलीम राओ

Yaha baste hai sab dharmo ke insa
Tum ghr sarhad ko bana lena tehzeeb
Mere hindustan ki zara unko bhi samjhana
Aaena vo rekhna saath apne is paar jo dekhe to
Us paar chamak jana khushboo se
Mere desh ki unko bhi mehkana
Bhookh pyas hm seh lege aan shaan tumko hai
Bachana ye desh hai veero ka piche na tum hat jana
Ummed jab kam ho jaan ki ti muskurana
Dil ke dard ko hoto pe kabhi na lana tut kar bikhar bhi jao
Agar tum zarra zarra to laut ke tum na aana
Tum desh pe mar jana hasrate ehle-e-vaten ki puri
Tu karke jana kafan tiranga ho tera lipat ke
Usme aana tum desh pe mar jana tum desh pe mar jana.

-Saleem Rao