हम सैनिक हैं बड़े हठीले, हम कुछ भी कर जायेंगे। अरि सुनकर पद ध्वनियों को, वो दिल ही दिल में दहशत खायेंगे। हम ऐसे वीर मतवाले हैं, जैसे लड़ सको हम लड़ जायेंगे। हम नहीं ठहरते पलभर भी, बैरी का सीना चीर के आयेंगे।। वीरगति चाहें भले मिले, पर दुश्मन का अस्तित्त्व मिटायेंगे।। -सर्वेश कुमार मारुत फरीदपुर बरेली ( उत्तर प्रदेश)
मेरी भी अपनी शैली है, काव्यमय अद्भुत पहेली है, अलंकारों से पूर्ण सुशोभित, भाव रसों से बनी अलबेली है। मेरी भी अपनी शैली है, काव्यमय अद्भुत पहेली है। आम समझ से परे है किंतु, बात सरल सुरीली है, आड़े- तिरछे समय में भी, बात न टेढ़ी-मेढ़ी है, मेरी भी अपनी शैली है, काव्यमय अद्भुत पहेली है। भाव सरस पर आम नहीं, हथियारों का यहां कोई काम नहीं, पंक्तियों की चोट अक्सर होती, तलवारों से भी पैनी है, मेरी भी अपनी शैली है, काव्यमय अद्भुत पहेली है।
*एक खत ( सैनिक का) माँ के नाम* माफ करना माँ मै तुझे अलविदा ना कह सका, तेरे आँचल में पल दो पल न रह सका रोज याद तेरी आती थी, छू कर मेरी रूह को गद गद कर जाती थी,
पर पता है माँ , इस मिट्टी की नरमी तेरे होने का हर पल मुझे आभास कराती थी प्यार से चुम कर तेरी ही तरह सहलाती थी रोज रात बाहे फैलाती थी कण कण अपने छनकाकर लोरी सुनाती थी फिर क्या!! रोज़ रात तुझसे मुलाकात हो जाती थी जब सपनो में तू मेरे आकर मुस्काती थी पर माँ, तेरी मेरी मुलाकात का समा सपनो तक ही सीमित रह गया तेरी रूह का चिराग , खुद अँधेरे में बह गया।
दहलीज पर बैठ कर ,तू मेरी राह तकती रही आढ़ में यादो की बैठ ,तू बिलखती रही
पर लुटा कर अपना सब कुछ इस वतन पर, मैं तुझे कुछ ना दे सका माफ करना माँ मैं तुझे अलविदा भी न कह सका ।। – अभिलाषा सिंघल
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