Category Archives: Hindi Poems on Festivals

Hindi Poem on Vishwakarma Day – विश्वकर्मा जयंती है आज

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विश्वकर्मा जयंती है आज
बंद रहेंगे सब काज
विश्व के महान निर्माता को
पूजेंगे सब कार्यकर्ता आज
विश्वकर्मा ने विश्व बनाया
कृष्ण की द्वारिका को रचाया
ऐसे दिव्य कारीगर को
हम सब का सदर प्रणाम
– अनुष्का सूरी

English Translation:

Today is Vishwakarma Jayanti. On this day all key workshops are closed. All workers pay respect to the divine creator Vishwakarma today. Vishwakarma is known to have created our world (as per Hindu belief) and he was the one who created Dwarika (abode of Lord Krishn). We pay our respect to such a divine creator.

 

Poem on Hindi Divas – हिंदी दिवस पर कविता

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हिंदी दिवस के अवसर पर
आओ हम सब करें विचार
कितनी बार किया है हमने
मातृ भाषा का कोई प्रचार
क्या अंग्रेजी हाई छोड़कर
कभी किया हमने नमस्कार
या कभी खोलकर देखा
हमने हिंदी का अख़बार
भारतीय हो तो हिंदी बोलो
राष्ट्र भाषा का भी करो संचार
-अनुष्का सूरी

Hindi Poem on Lord Ganesha – जय गणेश प्रभु

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जय जय शिव पारवती सपूत
जय जय दया दृष्टि के दूत
जय जय जग के पालनहार
जय जय मुसक पर सवार
जय जय मोदक आहार
जय जय कृपा अपार
जय जय गणेश प्रभु
आपका सेवक सदा बनूँ
– अनुष्का सूरी

Hindi Poem for Woman- नारी

तोड़ के पिंजरा
जाने कब उड़ जाऊँगी मैं
लाख बिछा दो बंदिशे
फिर भी आसमान मैं जगह बनाऊंगी मैं
हाँ गर्व है मुझे मैं नारी हूँ
भले ही रूढ़िवादी जंजीरों सेबांधे है दुनिया ने पैर मेरे
फिर भी इसे तोड़ जाऊँगी
मैं किसी से कम नहीं सारी दुनिया को दिखाऊंगी
जो हालत से हारे ऐसी नहीं मैं लाचारी हूँ
हाँ गर्व है मुझे मैं नारी हूँ

-सोनी कुमारी

Tod ke pinjra
Jane kab ur jaungi mai,
Lakhh bichha do bandise
Phir bhi aasman mai jagah banaungi mai,
Ha garv hai mujhe mai nari hu.
Bhale Hi rudhiwadi janjiro se bandhe hai duniya ne pair mere,
Phir bhi ise tor jaungi
Mai kisi se kam nahi sari duniya ko dikhhaungi,
Jo halat se hare aisi nahi mai lachari hu,
Mai to solo pe bhi chalkar apni rah bana lu mai aisi nari hu.
Mera apna astitva hai nahi mai lachari hu
Ha garv hai mujhe mai nari hu.

-Soni Kumari

Hindi Poem for Women – समानता

अंदर से रोती फिर भी बाहर से हँसती है
बार-बार जूड़े से बिखरे बालों को कसती है
शादी होती है उसकी या वो बिक जाती है
शौक,सहेली,आजादी मायके में छुट जाती है
फटी हुई एड़ियों को साड़ी से ढँकती है
खुद से ज्यादा वो दुसरो का ख्याल रखती है
सब उस पर अधिकार जमाते वो सबसे डरती है
क्योंकि बिकी हुई औरत बगावत नही करती है।

शादी हकोर लड़की जब ससुराल में जाती है
भूलकर वो मायका घर अपना बसाती है
घर आँगन खुशियो से भरते जब वो घर में आती है
सबको खाना खिलाकर फिर खुद खाती है
जो घर संभाले तो सबकी जिंदगी सम्भल जाती है
लड़की शादी के बाद कितनी बदल जाती है।
गले में गुलामी का मंगलसूत्र लटक जाता है
सिर से उसका पल्लू गिरे तो सबको खटक जाता है
अक्सर वो ससुराल की बदहाली में सड़ती है
क्योंकि बिकी हुई औरत बगावत नही करती है।

आखिर क्यों बिक जाती, औरत इस समाज में?
क्यों डर-डर के बोलती, गुलामी की आवाज में?
गुलामी में जागती हैं, गुलामी में सोती हैं
दहेज़ की वजह से हत्याएँ जिनकी होती हैं
जीना उसका चार दीवारो में उसी में वो मरती है
क्योंकि बिकी हुई औरत बगावत नही करती है।

जिस दिन सीख जायेगी वो हक़ की आवाज उठाना
उस दिन मिल जायेगा उसे सपनो का ठिकाना
खुद बदलो समाज बदलेगा वो दिन भी आएगा
जब पूरा ससुराल तुम्हारे साथ बैठकर खाना खायेगा
लेकिन आजादी का मतलब भी तुम भूल मत जाना
आजादी समानता है ना की शासन चलाना
असमानता के चुंगल में नारी जो फँस जाती है
तानाशाही का शासन वो घर में चलाती है
समानता से खाओ समानता से पियो
समानता के रहो समानता से जियो
असमानता वाले घरों की, एक ही पहचान होती है
या तो पुरुष प्रधान होता या महिला प्रधान होती है
रूढ़िवादी घर की नारी आज भी गुलाम है
दिन भर मशीन की तरह पड़ता उन पे काम है
दुःखों के पहाड़ से वो झरने की तरह झरती है
क्योंकि बिकी हुई औरत बगावत नही करती है।

-राहुल रेड