Hindi Poem on Makar Sakranti-Bezubaan Parinda


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मकर संक्रांति:::: बेज़ुबान परिन्दा

बौराया हुआ शहर अपनी कटी पतंगे ढूंढ रहा है,
खामोश मांजा सर सर हाथ से निकल रहा है,
आसमान में जलती लालटेनें, रोशन सा सकरात मन रहा है,
एक बच्चा हाथ में कटी पतंगे का ढेर लिए घर लौट रहा है,
कल लाल परसों पीली दिन भर का उत्सव नहीं,
साल भर की उम्मीदें जगा रहा है,
बेखौफ जमीं की दूरी को नगें पांव खगालते,
नजरें ऊपर आसमान की रोशनियों को ढूंढते,
सामने बेसुध पडा परिन्दा, मांजे के जख्म में तर बतर सांसे गिन रहा है,
एक रोशनी होले से नीचे आयी,
आह! गाड़ियों की सरसराहट खून में तब्दील, हर शख्मुस मुआयना कर रहा है,
बेसुध परिन्दा मानो चीखे जा रहा है,
कोई मसीहा इधर भी देखे,
शहर की बेपरवाही से कोई बेजान कट रहा है,
तो कोई गिरती रोशनियों से जल रहा है,
फिर कौन कहता है कि मेरा शहर संवर रहा है,
झुठी चमक से रोशन और सच से सब कुछ दहक रहा है,
तीन से फुटपाथ पर बैठा गोलू दुबका हुआ है,
रंगीन पतंग से बहक रहा है, मांजे से कट रहा है,
और पता नहीं किस बेरहम बेपरवाही से सुकून जल रहा है,
बौराया हुआ शहर अपनी कटी पतंग को ढूंढ रहा है!!!!!!!!
डाॅ. अवन्तिका

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35 thoughts on “Hindi Poem on Makar Sakranti-Bezubaan Parinda”

  1. A beautiful heart with nonstop helping tedency emphasised u these kind of poems……thanks for hindi poems .org to make possible to see poem of my bestiii

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  2. Well done 👍👍……….
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    It’s very nice , keep it up😊

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  3. The words have been used so nicely that a bit got confused about should I be happy and praise such a great writing or should I feel bad for the essence of poem u wanted to show !😀 Splendid job avi. 😉

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  4. बहुत खूबसूरत कविता लिखी हैआपने ।।भगवान आपकी हर दुआ पूरी करें !सदा चमकते रहो।।

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