Tag Archives: Hindi Poems on Philosophy

Hindi Poems on Emotions – मैं मूक नहीं


इन विचारोँ की उधेडबुन मे,
ढूँढ कहाँ से लाऊ दो शब्द
परन्तु ये अहं नहीं ।
मैं मौन,पर मूक नहीं।

देखा है मौन समुद्र मेँ,
लहरोँ को उमडते उतरते
परन्तु ये विनाशक नहीं ।
मैं मौन,पर मूक नहीं।

देखा है स्थिर भूधर को
कंपन के आक्रोश से हिलते
परन्तु ये भीषण नहीं।
मैं मौन,पर मूक नहीं।

देखा है तपते लौह को,
अग्नि के आवेग से
परन्तु ये पश्चाताप नहीं।
मैं मौन,पर मूक नहीं।

देखा है उन विचारोँ को,
दबते शब्दोँ के अभाव से
परन्तु मैं मूक नहीं।
परन्तु मैं  मूक नहीं।

-हितेश कुमार गर्ग

En vicharon ki udhedbun mein
Dhund khan se laun do shabd
Parntu ye ahn nahi
Main maun, par mook nahi

Dekha hai maun smander mein
Lahron ko umdte utrate
Parntu ye vinashak nahi
Main maun, par mook nahi

Dekha hai shithar bhudar ko
Kampan me akrosh se hilte
Parantu ye bhishan nahi
Main maun, par mook nahi

Dekha hai tapte lohe ko
Agani ke aaveg se
Parntu ye pschtap nahi
Main maun, par mook nahi

Dekha hai un vicharon ko
Dabte shbdo ke abhab se
Parntu main mook nahi
Parntu main mook nahi

-Hitesh Kumar Garag

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Hindi Poems on Philosophy-रोशनी भरी डिब्बी


एक छोटी सी है डिब्बी जिसमे है कुछ रोशनी भरी
एक बिंदु एक ज्योति के समान संपुर्ण फिर भी निराकार।।
रोशनी तेज़ इतनी की सूरज भी शरमाये गर्म इतनी की
एक मादक विस्फोट से हो जाये इस प्रकाश को मैं समेटना चाहती हूँ
ताउम्र इसी रोशनी में नहाना चाहती हूँ
इसकी गर्माहट में पिघलना चाहती हूँ
फिर पिघल कर फिर से घड़ना चाहती हूँ।।
एक छोटी सी है डिब्बी जिसमे है कुछ रोशनी भरी ……
यह रोशनी नही मगर है तरंगों का समंदर इस समंदर में मैं मछली बन तैरना चाहती हूँ
एक गोताखोर सी बन इसकी गहराई में उतरना चाहती हूँ
थोड़ी इठलाती हुई मै फिर से उभरना चाहती हूँ।।
इक छोटी सी है …. यह नही सिर्फ रोशनी है
यह एक जादूगरी इक गुदगुदी और अजीब सी सिरहन से भरी
इस गुदगुदायी सिरहन में मै लिपटना चाहती हूँ
इस जादूगरी को मै अपनी बाहों में भरना चाहती हूँ इक छोटी सी है ……
है नही ये सिर्फ रोशनी ये है प्यारी मिलान की रात अपने प्रियतम को समर्पित
एक अनूठी सौगात इस रात की चांदनी में मै चमकना चाहती हूँ
इस मिलन के क्षड़ों में में ठहरना चाहती हूँ मैं नाचना चाहती हूँ
में झूमना चाहती हूं इस ज्योति बिंदु को में चूमना चाहती हूँ ।। इक छोटी सी है ….
इस रोशनी का है जो एओह एक रोशनकार वही तोह है
व्याप्त और देता सबको आकार उस रोशनकार के हाथों मैं संवरना चाहती हूं
जड़ बन उसके हाथों फिर निखरना चाहती हूं उस ज्योति बिंदु में मैं समाना चाहती हूँ
मैं पिघलना चाहती हूं मैं मचलना चाहती हूं इस रोशनी में मैं नहाना चाहती हूं
मैं नाचना चाहती हूँ मैं झूमना चाहती हूँ।।।
इक छोटी सी है डिब्बी जिसमे है कुछ रोशनी भरी।।।।

-शिल्पा

Ek chotti si hai dibbi jisme hai kuch roshni bhari
Ek bindu ek jyoti ke saman sampuran fir bhi nirakar
Roshni tez etni ki suraj bhi sarmaye garm etni ki
Ek madak visfot se ho jaye es parkash ko main smeintna chahti hoon
Taumar es roshni menhana chahti hoon
Eski garmahat mepighlna chahti  hoon
Fir pighal kar fir se gadna chahti  hoon
Ek chotti si hai dibbi jismekuch roshni bhari
Yeh roshni nai magar hai tarngon ka samndar es smandr memain machli ban tarna chahti  hoon
Ek gotakhor si ban es gahrai meutrna chahti  hoon
Thodi ethlat  hoone main fir se ubhrna chahti  hoon
Ek choti si hai yeh nai sirf roshni hai
Yeh ek jadugari ek gudguddi aur ek ajv si sirhan se bhari
es gudgudayi sirhan memain liptna chahti  hoon
Es jadugari ko main apni bahon mebhrana chahti  hoon..ek choti si hai
Hai nahi ye sirf roshni ye hai.pyari milan ki raat apne priytam ko samrpit
Ek anuthi saugaat es raat ki chandani memain chamkna chahti  hoon
Es milan ke shdo memain thahrna chahti  hoon main nachna chahti  hoon
Main jhumna chahti  hoon. es jyoti bindu ko main chumna chahti  hoon ek choti si hai
Es roshni ka hai jo a  oh ek roshnakar whi to hai
Viyapat aur deta sabko aakar us roshnakar ke hathon main svarna chahti  hoon
Jad ban uske hathon fir nikhrna chahti  hoon es jyoti bindu memain smana chahti hoon
Main pinghlna chahti  hoon main machalna chahti  hoon es roshni mein  main nhana chahti  hoon
Main nachna chahti  hoon main jhumna chahti  hoon
Ek chotti si hai dibbi jismehai kuch roshni bhari

-Shilpa

Hindi Poem on Objects-हाँ हूँ मैं


हाँ हूँ मैं
नया अभी
कवि नहीं
कवि कभी
जो चाहे कह लो,
जो सोचो
वही सही
हा पर मैं
हूँ कही
था सही
हूँ सही
मन की बात
कहुँ कभी
पर माने मेरी
कोन सही
पागल हूँ मैं
यही सही
क्यो भाई
“हाँ सही”
समाज अभी
क्या कहे
पल में बदले
देखो सभी
जाने कहाँ
मुझे अभी,
अभी कुछ भी
ना सही,
हा कहे
सो कहे
बेकार मुझे
ना कहे
अभी शुरू
हूँ ही,
क्या कहूँ
क्या कहूँ
नया रूप
देख मेरा
मुझसे पूछे
सब अभी
ना कहूँ
क्या कहूँ
“अभी बस शुरूआत सही”
अभी नहीं
अभी नहीं,
हाँ कुछ हूँ
पर अभी नही
याद करेगे
कभी कभी,
इक पागल था
यही कही
हाँ हूँ. मैं
नया अभी
कवि नहीं
कवि कभी
– मनोज कुमार बदलानी