Category Archives: Hindi Poems on Life

Hindi Poem on Objects-हाँ हूँ मैं


हाँ हूँ मैं
नया अभी
कवि नहीं
कवि कभी
जो चाहे कह लो,
जो सोचो
वही सही
हा पर मैं
हूँ कही
था सही
हूँ सही
मन की बात
कहुँ कभी
पर माने मेरी
कोन सही
पागल हूँ मैं
यही सही
क्यो भाई
“हाँ सही”
समाज अभी
क्या कहे
पल में बदले
देखो सभी
जाने कहाँ
मुझे अभी,
अभी कुछ भी
ना सही,
हा कहे
सो कहे
बेकार मुझे
ना कहे
अभी शुरू
हूँ ही,
क्या कहूँ
क्या कहूँ
नया रूप
देख मेरा
मुझसे पूछे
सब अभी
ना कहूँ
क्या कहूँ
“अभी बस शुरूआत सही”
अभी नहीं
अभी नहीं,
हाँ कुछ हूँ
पर अभी नही
याद करेगे
कभी कभी,
इक पागल था
यही कही
हाँ हूँ. मैं
नया अभी
कवि नहीं
कवि कभी
– मनोज कुमार बदलानी

Hindi Poem on Courage – जिंदगी की जंग


जिंदगी की जंग जीत जाने की हिम्मत तो है
रोजगार ना सही पर कमाने की हिम्मत तो है

वक्त बेवक्त मिले फिर भी कोई गम नही
सूखी रोटी ही सही खाने की हिम्मत तो है

महलों में रहने की “राहुल” तेरी औकात नही पर
तिनका-तिनका जोड़, घर बनाने की हिम्मत तो है

डूब गयी पतवारें लेकिन हौसला अभी बाकि है
कश्ती को साहिल तक पहुँचाने की हिम्मत तो है

काट डालो जुबान चाहें शायर की आज तुम
हकीकत को कलम से बताने की हिम्मत तो है

सत्ता के गलियारों में भ्रष्ट सरकारों के खिलाफ
अकेली आवाज ही सही उठाने की हिम्मत तो है

– राहुल रेड

Zindgi ki jung jitne ki himmat to hai
Rozgar na shi par kmane ki himmat to hai

Waqt bewaqt mile fir bhi koi gum nahi
Sukhi roti hi shi khane ki himmat to hai

Mehlonme rhne ki rahul teri aukaat nahi par
Tinka tinka jod kar ghr bnane ki himmat to hai

Dub gai patware lekin hosla abhi baki hai
Kashti ko sahal tk phuchane ki himmat to hai

Kaat dalo juban chahe shayr ki aaj tum
Hakikat ko kalam se btane ki himmat to hai

Stta ke galiyaro mein bhrast sarkaro ke khilaf
Akeli aawaj hi shi uthane ki himmat to hai

– Rahul Red

 

Hindi Poem On Freedom – उड़ान की शुरुआत


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लग रहा था  कि ये बात की शुरुआत होगी
पर क्या पता था की ये अंत की शुरुआत होगी
चलो शुरुआत  तो हुई , चाहे अंत की या शुरूआत  की
पिंजरे में कैद थी वो सोच रही थी फुर्र होने की
पर लगे उसके फड़फड़ाने ,हो गई शुरुआत उड़ान की
भरने लगी जब वो उड़ान तो उड़ ना सकी वो नादान
दम  तोड़ दिया उसने हो गई उसके अंत की शुरुआत
चाहे अंत की हो या उड़ान की
चाहे अंत की हो या उड़ान की
पर हो तो गई शुरुआत
 पर हो तो गई शुरुआत

-मानसी गोयल

Lag raha tha ki ye baat ki shruaat hogi…
par kya pta tha ki ye aant ki shruaat hogi…
chalo shruaat toh hui, chaahe aant ki ya shuruaat ki…
pinjade main kaid thi wo, soch rh thi furrr hone ki..
par lage uske phadfhadaane, ho gyi shruaat udaan ki…
bharne lagi jab wo udaan, toh udh na saki wo naadaan,
dam tod diya usne ho gyi uske aant ki shruaat…
chahe aant ki hui ho ya udaan ki…
chahe aant ki hui ho ya udaan ki…
par ho toh gyi shruaat…
par ho toh gyi shruaat..

-Mansi Goyal

Hindi Poems on Emotions- छोड़ आए


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बहुत पुराना घर छोड़ आए,
हम उन आँखों को तन्हा अकेला छोड़ आए,
गलियों से निकले कूचे छोड़ आए,
आँखों से निकले आंसू छोड़ आए,
दोस्ती के पुराने दोस्त छोड़ आए,
शहर क्या आ गए गाँव छोड़ आए,
चलते चलते ये किधर चले आए,
अकेले रह गए सब छोड़ आए,
समुन्दर में कितने भवंर छोड़ आए,
मोहबत के हसीं सफर छोड़ आए,
शामों में चुलबुली राते छोड़ आए,
सुबह की वो पहली किरण छोड़ आए,
कोयल की कूकती कूक छोड़ आए,
वो वारिस की पहली फूआर छोड़ आए,
ये कैसे पल आये की सब छोड़ आए,
क्यों तन्हा अकेला तुम्हे छोड़ आए,
क्यों बहुत पुराना वो घर छोड़ आए।

-गौरव

Bahut purana ghar chhod aaye
hum un aankhon ko tanha akela chhod aaye
galiyon se nikle kuche chhod aaye
aankhon se nikle aansu chhod aaye
dosti k purane dost chhod aaye
shar kya aa gye gaon chhod aaye
chalte chalte ye kidhar chle aaye
akele reh gye sab chhod aaye
smunder me kitne bhbar chhod aaye
mhhobbat k hasi sfr chhod aaye
shamo me chul buli raatein chhod aaye
subh ki wo phli kiran chhod aaye
koyal ki kukti kuk chhod aaye
wo barish ki phali faar chhod aaye
ye kese pal aaye ki sab chhod aaye
kyon tanha akela tumhe chhod aaye
kyon purana ghr chhod aaye

-Gurav

Poem on Modern Life-आधुनिक युग


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कुछ गाड़ियों में चलते है कुछ टुकड़ो पर पलते है,

कुछ ऐ सी में रहते है कुछ सड़को पर सड़ते है,

इन्शानियत को भूलकर लोग धर्मो के लिए लड़ते हैं,

लानत है इस युग पे जिसे आधुनिक कहते है ।

इस दुनियाँ में भी लोग अजीबोगरीव रहते है,

कुछ इंग्लिश का पउआ लगाते कुछ रोटी को तरसते है,

बुजुर्गो को ठुकराकर लोग गाय को माता कहते है,

कुछ दुःखों से वंचित तो कुछ हँसते हँसते सहते हैं,

लानत है इस युग पे जिसे आधुनिक कहते है ।

गरीबो की मेहनत पूँजीपति खा रहे हैं,

आजकल के विद्यार्थी यो यो हनी सिंह गा रहे है,

पेड़ दिन बा दिन तेजी से काटे जा रहे है,

खुद जंगल कटवाकर धरती को माँ कहते है,

लानत है इस युग पे जिसे आधुनिक कहते है ।

बेघर हुए जंगली को जो जानवर कहते है,

वो क्या जानें असली जानवर तो शहरो में रहते है,

रेप की घटनाएँ इस कदर हो रही हिंदुस्तान में,

इंसानियत मिटती जा रही है आज के इंसान में,

कुछ लोग बेटियों को धरती का बोझ समझते  है,

लानत है इस युग पे जिसे आधुनिक कहते है।

कोई अपनों को खोता है कोई भूखे पेट सोता है,

जिंदगी के सफ़र में हर गरीब रोता है,

बहुत से झमेले हैं इन दर्द गमो के मेले में,

जीकर भी तू मर रहा गुमनामी और अकेले में,

जिंदगी तो मेहमान है पल दो पल जी लेने में,

हर दुःख और हर गम हँसकर पी  लेने में,

किसी को होती नहीं सूखी रोटी तक नसीब,

कोई खिला रहा कुत्तो को ब्रेड बटर के पीस

इन ब्रेड बटर को देखकर बदनसीबो के दिल मचलते है,

लानत है इस युग पे जिसे आधुनिक कहते है ।

-राहुल कुमार