Hindi Poem on Motivation-Chalta Chal

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चलता चल

ग़म छूपा हँसता चल
खुद को ही छलता चल ।

कदमों में है मंजिल
बस उम्मीदें करता चल ।

राहें तो हैं मुश्किल
हिम्मत कर बढ़ता चल ।

रो मत कायर बनकर
आँसू पी लड़ता चल ।

रौशन कर दिल की लौ
अन्दर से जलता चल ।
-अजय प्रसाद

टी जी टी इंग्लिश
डीऐवी पीएस पीजीसी बिहारशरीफ़
नालंदा, बिहार-८०३२१६

Hindi Poem on Modernization-आधुनिकीकरण पर कविता

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आधुनिकीकरण
आधूनिकरण ने देखो क्या किया कमाल है
बात-बात पर अब उठता सवाल है
शुद्धिकरण का अब वो ज़माना नहीं रहा
हर तरफ मिश्रण का अब बोलबाला है
नीम की दाँतून के ज़माने गुज़र गये
अब तो कॉलगेट में भी मचा बवाल है
लाईन में लगने का झंझट ही नहीं रहा
सब कुछ पास होते हुए भी बुरा हाल है
कोसों दूर की खबरें पल भर में पहुँचे
तकनीक ने ऐसा बिछाया जाल है
ज़मीन-आसमान अब एक हो गये
हवाई-जहाज़ इन दोनों की बनी जो ढाल है
गौर से देखो सच्चाई का आइना
बढती उम्र पर भी मेक-अप की चाल है
कम्प्युटरीकरण का दौर तो देखो
हर रोज़ बाजार में होता धमाल है
वाह !वाह रे आधुनिकीकरण तु तो बेमिसाल है।
-गरीना बिश्नोई

Motivational Poem on Life-Mera Jeevan

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मेरा जीवन

खुद की आहट से क्यों डरता है
जीते जी क्यों मरता है
कष्ट नहीं विकराल इतना
डरता है तू उससे जितना
करके हौसला बढ़ कर तो देख
ऊंचाइयों पर चढ़कर तो देख
दुनिया जितनी ज़ालिम है
जीवन उतना अमिय है
जुटा अपनी ताकत को
और दुनिया को दिखा दे
मैं भी गुड़ाकोष हूँँ
यह पाठ सभी को सिखा दें
कठिनाइयों से पूछ क्या हाल करूं मैं तेरा
जा नहीं डरता मैं तुझसे क्योंकि जीवन है यह मेरा
– रीत(रितिका) दाँगी

Hindi Poem on Hope-Hansi Rang

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जीवन तो मौजों की धारा में बहना चाहता है
पर वैसा नहीं होता, जो मन कहना चाहता है।
सामने जो आती मुश्किलें रोकें तो कैसे रोकें?
ये आती है जाने क्यूँ?और नहीं दिल सहना चाहता है
हमें इतनी खबर तो नहीं जो जान सकें कुछ भी
कुछ जान लें चाहे पर मन चैन से रहना चाहता है
न रोक सके कोई आते-जाते मन के विचारों को
रंग भरे सपनों में मन और हँसी रंग भरना चाहता है

-संजय

Hindi Poem on Greatness of Mother-Aisi Kyo Hai Tu Maa

people-3065370_960_720आखिर ऐसी क्यों है तू माँ..

घर से बाहर जाते वक़्त
तेरी आँखों से न ओझल हो जाऊँ मैं
उस हलक तक मुझे निहारती रहती है तू
आखिर ऐसी क्यों है तू माँ…।

तेरे टूट जाने में ही मेरा बनना तय था
फिर भी बेशर्म-सा उग रहा था मैं
और ख़ुशी-ख़ुशी ढ़ल रही थी तू
आखिर ऐसी क्यों है तू माँ…।

याद है वो दिन मुझे जब घर में
खाने वाले पांच और रोटी के टुकड़े थे चार
तब ‘मुझे भूख नहीं है’ ऐसा कहने वाली थी तू
आखिर ऐसी क्यों है तू माँ…।

आज सबकुछ बदला-बदला नज़र आता है
फिर भी इस कैल्कुलेटरमूलक दुनिया में
न बदलने वाली सिर्फ एक ही शख़्स है तू
आखिर ऐसी क्यों है तू माँ…।

कुदरत के उस सरल करिश्में को सलाम
जिसका अक्स मैं खुद में पाता हूँ
अपना सबकुछ त्याग कर भी मुझे अपनी
प्रतिकृति होने का आभास कराती है तू
आखिर ऐसी क्यों है तू माँ…।

हमेशा शिकवा रहेगा मुझे तुझसे यह कि
क्यों तू हमेशा लुटाती रही और मैं रहा लूटता
फिर भी शिकन तक नहीं तेरे माथे पर किंचित
आखिर ऐसी क्यों है तू माँ…।

  • © मीना रोहित (आयकर अधिकारी , दिल्ली)

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