Patriotic Hindi Poem-Desh

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देश
मेरे देशवासियों अब तो नींद छोड़ो
दिनकर निकल गया है सवेर हो रहा है
दुनिया में हर तरफ भोर हो रही है
अज्ञानता की रातें कब की गुजर गई हैं
इस सोई हुई फ़िज़ा में एक ख्वाब दिख रहा है
देखो सूरज के तेज से आलोक आ रहा है
इस निकली हुई सुबह में ख्वाब आ रहा है
पूरब हो या और वो पश्चिम कब के जगे हुए है
एक हम हैं कि जो अब तक ख्वाबों में ही पड़े है
उठो नींद तोड़ो अब सुबह हो गयी है
देखो इन फ़िज़ाओं में कलियाँ खिली खिली हैं
सदियों से नींद में थे अबतक जो पीछे रह गए थे
सब दुनिया बदल रहे थे इधर हम आपस में लड़ रहे थे
अब उठो ख्वाब बदलो और बदलो ये नज़ारा
आसमां और धरा पर आगे हो हिन्दोस्ताँ हमारा
दुनिया को दिखा दो अब अपने मिट्टी की ताकत
पता उन्हें भी चलेगा जब वो जानेंगे हकीकत
-अलोक दूबे

Desh

Mere deshwasiyo ab to neend chodo

Dinkar nikal gaya hai savera ho raha hai

Duniya mei har taraf bhor ho rahi hai

Agyanta ki ratei kab ki guzar gayi hain

Is soyi hui fiza mein ek khwab dikh raha hai 

Dekho suraj ke tej se alok araha hai 

Is nikli hui subah mein khwab araha hai 

Purab ho ya aur wo paschim kab ke jage hue hain

Ek ham hain ki jo ab tak khwabon mein hi pade hain 

Utho neend todo ab subah ho gayi hai

Dekho in fizaon mein kaliyan khili khili hain

Sadiyon se neend mein the ab tak jo peeche reh gaye the

Sab duniya badalrahe the idhar ham apas mein lad rahe the

Ab utho khwab badlo aur badlo ye nazara

Asmaa aur dhara par aage ho hindustaa hamara

Duniya ko dikha do ab apne mitti ki takat

Pata unhein bhi chalega jab wo janenge haqiqat 

-Alok Dube (Poet)

 

Hindi Poem on New Year Blessings-Nav Varsh Ka Shubhashish

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नववर्ष का शुभ आशीष
हो उन्नत धरा अनाजों से,
हो विकसित नर विचारों से,
न जन्में लड़का और लड़की,
बस आंगन खिले संतानों से,
आगे बढ़ें मिल सब धर्म यहाँ,
प्रेम स्वर निकले हर इंसानों से,
यही सिखा गया हमें बीता अतीत,
है यही नव वर्ष का शुभ आशीष।
-मयंक गुप्ता

Never Quit Poem in Hindi-Kayi Baar Shuruwat Ki Hai

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कई बार शुरुवात की है

कई बार शुरुवात की है,
कई बार नाकाम हुआ हूँ
नहीं है आसान, कोशिश कर लो
यूं ही नहीं बदनाम हुआ हूँ

आसानी से कहते हैं सब
ऐसी क्या बड़ी बात है वहां
सबसे अनुरोध करूंगा मैं
आकर देखो मेरे साथ यहाँ

आकर देखो कैसे मैं
हर रोज़ ही खुद से लड़ता हूँ
एक जीत की आस में खुद से मैं
हर रोज़ ही हारता रहता हूँ

करता हूँ कोशिश छोड़ सकूं
आलस्य और अवरोधों को
पढ़ता हूँ इसी उम्मीद में
माँ के दिए उन श्लोकों को

करता हूँ कोशिश कहीं मुझे
मिल जाए कोई राह नई
अपने इस विचलित मन को मैं
कर सकूँ नियंत्रित काश कभी

सुनता हूँ लोगों को मैं
जो चले कभी थे राह यही
थे जीते वे इस शत्रु से
और पाया था परिणाम सही

हर रात को सोने से पहले
कहता हूँ कल बेहतर होगा
करता हूँ आशा रोज़ यही
शायद नया कोई अवसर होगा

सुना है समय लगता है,
मन को नियंत्रित करने में
बनना मनुष्य आसान नहीं
आसान है ये सब कहने में

शायद समझा हूँ कुछ हद तक
क्या अर्जुन को समझाया था
शत्रु प्रबल तो वहां भी था
पर अर्जुन पर श्री कृष्ण का साया था

पर छोड़ के आशा का दामन
होने वाला कुछ काम नहीं
चलो चलता हूँ फिर लड़ता हूँ
शायद अभी आराम नहीं

करता हूँ एक शुरुवात नई
एक और मैं कोशिश करता हूँ
हो शायद सच जो सुना था मैंने
कोशिश करने वालों की हार नहीं

-मुसाफिर 

Hindi Poem on Save Daughter-Beti Hai To Jahaan Hai, Beti Ek Vardaan Hai

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बेटी है तो जहान है, बेटी एक वरदान है ! 

आज देश के हर कोने में, संकट सा मंडराया है !

प्रलय काल दे रहा निमंत्रण, खतरा सिर पर आया है !!

क्यों असुरक्षित हुई बेटियाँ, हिंदुस्तान की धरती पर ?

जिसने नहीं पालकी देखी, सो चढ़ जाती अर्थी पर !!

खून बह रहा कन्याओं का, देख रहे तुम खड़े हुए !

राखी का सम्मान कहाँ है, किस लज्जा में पड़े हुए ?

नहीं बचा सकते बहनों को, ऐ भैया धिक्कार तुम्हें !

इस धरती पर जीवित रहने का, नहीं है अधिकार तुम्हें !!

कहां सो रहे धर्मवान, तुम सत्ता के गलियारे में !

कैसे देश महान रहेगा, कर्म-धर्म अंधियारे में !!

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, तुमने दिया था नारा !

होगी सुरक्षा बेटी की, अब कहाँ अभिमान तुम्हारा !!

शर्म करो ऐ नेताओं, या कुर्सी कर दो खाली !

करो काम ऐसा मंत्री जी, देश में हो खुशहाली !!

कुछ को कोख में मार दिया, नहीं माता-पिता लज्जाते !

बिना पढ़ाऐ भार समझ कर, जल्दी ब्याह कराते !!

फिर भी क्यों दहेज के कारण, आग लगाई जाती !

या तो बेटियाँ स्वयं तंग हो, फांसी पर चढ़ जाती !!

आती नहीं शर्म नामर्दों, इनकी चिता सजाते हुए !

बाहर जाकर निज कर्मों का, फिर गुणगान सुनाते हुए !

डूब मरो ऐ दुनिया वालों, तुम्हें शर्म नहीं आती है ?

क्या सुकून मिलता तुमको, अर्थी बिटिया की जाती है !!

याद रहे जो बेटी को, इस तरह सताया जाएगा !

होगी कयामत दुनिया में, कोई जीव नहीं बच पाएगा !!

ऐ भैया ये विनय हमारी, बेटी की रक्षा करना !

बहन जान कर हर लड़की के, सारे कष्टों को हरना !!

जब बेटी हो जाए सुरक्षितबेटे, बेटे समान अधिकार हो !

निश्चय डूब रही नैया और, देश का बेड़ा पार हो !!

बनकर कृष्ण दु:शासन से, द्रौपदी की लाज बचाना है!

कहे पुष्पेंद्र सिंह यादव, अपना कर्तव्य निभाना है !!
नवयुग की चाह रखने वाले क्रांति कवि -पुष्पेंद्र सिंह यादव

Hindi Poem on Value of Time: Ehmiyat Waqt Ki

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अहमियत वक्त की

अहमियत वक्त की तब समझ आई
जब जीवन में ठोकर पर ठोकर खाई,
जब वक्त की कदर ही न की
तभी तो मुसीबतें भी जीवन में बिन बुलाए आई।
फिर तो हमेशा कहते रहे इधर कुआँ, उधर खाई,
अहमियत वक्त की तब समझ आई
जब जीवन में ठोकर पे ठोकर खाई।।

हर वक्त खुशियों की महफ़िल सजाई
पर एसी महफ़िल ही क्या
जिसमें वक्त की कीमत ही समझ न आई।
महफ़िल तो सजा दी हमने बेवक्त बेवजह
पर अंजाम की बात कभी अपने ज़हन में ना आई,
अहमियत वक्त की तब समझ आई
जब जीवन में ठोकर पर ठोकर खाई।।

-रोहित